सीजी भास्कर, 25 अगस्त : आगामी विधानसभा चुनावों से पहले आरक्षण मुद्दा (Reservation Issue) एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में आ गया है। उत्तर प्रदेश समेत कई चुनावी राज्यों में आरक्षण व्यवस्था में बदलाव और जातिगत राजनीति को लेकर बयानबाजी तेज हो गई है। सवर्ण समाज के प्रदर्शनों और विपक्ष के हमलों के बीच बीजेपी के सामने आरक्षण मुद्दा (Reservation Issue) बड़ा राजनीतिक संतुलन साधने की चुनौती बनता दिख रहा है।

जंतर-मंतर से लखनऊ तक गरमाया मुद्दा Reservation Politics
दिल्ली के जंतर-मंतर पर सवर्ण युवाओं और सामाजिक संगठनों की ओर से आरक्षण व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शनकारी जाति आधारित आरक्षण की समीक्षा और आर्थिक आधार को प्राथमिकता देने की मांग कर रहे हैं। इसके बाद लखनऊ में भी इस मुद्दे को लेकर विरोध प्रदर्शन हुआ। प्रदर्शन से जुड़े लोगों ने उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक से मुलाकात कर अपनी मांगें रखीं। ब्रजेश पाठक ने उनकी मांगों को केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाने का आश्वासन दिया।
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विपक्ष ने बीजेपी पर बोला हमला
ब्रजेश पाठक से मुलाकात के बाद कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा और आजाद समाज पार्टी ने बीजेपी पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि आरक्षण सुधार के नाम पर आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग के अधिकारों से जोड़ते हुए बीजेपी पर हमला बोला। बसपा प्रमुख मायावती और आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने भी आरक्षण व्यवस्था में किसी तरह के बदलाव का विरोध किया है।
चुनावी राज्यों में बढ़ सकती है सियासी तपिश
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं। ऐसे समय में आरक्षण मुद्दा (Reservation Issue) गरमाने से बीजेपी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
विपक्षी दल जातिगत जनगणना में ओबीसी के लिए अलग कॉलम और आरक्षण का दायरा बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर सवर्ण संगठनों की ओर से मौजूदा व्यवस्था में बदलाव की मांग उठाई जा रही है। दोनों पक्षों के बीच बढ़ती राजनीतिक खींचतान बीजेपी के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा कर रही है।
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2024 में भी आरक्षण बना था बड़ा चुनावी मुद्दा
आरक्षण का मुद्दा 2024 के लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी के लिए चुनौती बना था। विपक्ष ने संविधान और आरक्षण को लेकर बीजेपी पर लगातार हमला किया था। विपक्ष की ओर से यह दावा किया गया था कि बीजेपी को बड़ी संख्या में सीटें मिलने पर संविधान में बदलाव और आरक्षण व्यवस्था पर असर पड़ सकता है। बीजेपी ने इन आरोपों को खारिज किया था।
चुनाव परिणामों में उत्तर प्रदेश समेत कुछ राज्यों में बीजेपी को नुकसान हुआ। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस की सीटों की संख्या भी बढ़ी। चुनाव के बाद बीजेपी की समीक्षा में संविधान और आरक्षण से जुड़े विपक्षी नैरेटिव को दलित और ओबीसी मतदाताओं के बीच पार्टी के प्रदर्शन पर असर डालने वाले कारणों में माना गया।
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बीजेपी के सामने दोहरी चुनौती
बीजेपी के लिए आरक्षण मुद्दा (Reservation Issue) इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि पार्टी ने पिछले वर्षों में गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वर्गों के बीच अपना सामाजिक आधार मजबूत किया है। वहीं सवर्ण समाज पार्टी का पारंपरिक समर्थन आधार माना जाता है।
ऐसे में अगर बीजेपी सवर्ण समाज की आरक्षण में बदलाव की मांग का समर्थन करती है तो दलित और ओबीसी मतदाताओं के नाराज होने का खतरा है। वहीं अगर पार्टी मौजूदा व्यवस्था में किसी बदलाव से दूरी बनाए रखती है तो सवर्ण वर्ग में असंतोष बढ़ने की आशंका रहेगी।
जातिगत राजनीति से बिगड़ सकता है सामाजिक समीकरण
आरक्षण के साथ जातिगत जनगणना का मुद्दा भी विपक्ष लगातार उठा रहा है। बीजेपी के सामने चुनौती यह है कि अलग-अलग सामाजिक वर्गों को साथ रखते हुए चुनावी समीकरण को बनाए रखा जाए। 2024 के लोकसभा चुनाव में संविधान और आरक्षण का मुद्दा बीजेपी के खिलाफ विपक्ष के प्रमुख नैरेटिव में शामिल रहा था। अब आगामी विधानसभा चुनावों से पहले एक बार फिर आरक्षण मुद्दा (Reservation Issue) राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। ऐसे में आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है।
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