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Water Saving Technology : धान की खेती में पानी बचाने की नई तकनीकें बनीं किसानों का सहारा, 40% तक घट सकती है सिंचाई की जरूरत

By Newsdesk Admin
11/06/2026
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Water Saving Technology
Water Saving Technology

सीजी भास्कर, 11 जून : जलवायु परिवर्तन, अनिश्चित वर्षा और घटते भूजल स्तर के बीच किसानों के सामने सिंचाई की चुनौती लगातार बढ़ रही है। ऐसे में पानी बचाने वाली तकनीकों (Water Saving Technology) को अपनाने पर कृषि विशेषज्ञों ने विशेष जोर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि वैज्ञानिक सिंचाई प्रबंधन और आधुनिक कृषि तकनीकों के उपयोग से धान की फसल में 30 से 40 प्रतिशत तक पानी की बचत करते हुए बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इससे न केवल सिंचाई लागत में कमी आएगी बल्कि भविष्य में जल संकट से निपटने में भी किसानों को मदद मिलेगी।

छत्तीसगढ़ में खरीफ फसलों का रकबा लगभग 57 लाख हेक्टेयर है, जिसमें धान की खेती का क्षेत्र सबसे अधिक है। सामान्यतः धान की एक एकड़ फसल को पूरे सीजन में करीब 60 लाख लीटर पानी की आवश्यकता होती है, लेकिन आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक सिंचाई प्रबंधन के जरिए इस खपत को काफी हद तक कम किया जा सकता है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि किसान पारंपरिक पद्धतियों के साथ नई तकनीकों को अपनाएं तो उत्पादन प्रभावित किए बिना जल संरक्षण संभव है।

वैज्ञानिक सिंचाई तकनीकों से होगी पानी की बचत

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राईंग (AWD) तकनीक धान की खेती में पानी बचाने का एक प्रभावी तरीका है। इस तकनीक में खेत को लगातार पानी से भरे रखने के बजाय निर्धारित अंतराल पर सूखने दिया जाता है और आवश्यकता अनुसार दोबारा सिंचाई की जाती है। इससे पानी की बचत होने के साथ धान की जड़ों का विकास बेहतर होता है और पौधों को पर्याप्त ऑक्सीजन भी मिलती है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि AWD तकनीक अपनाने से मीथेन गैस के उत्सर्जन में भी कमी आती है, जिससे पर्यावरण संरक्षण में मदद मिलती है। इसके अलावा फसल की क्रांतिक अवस्थाओं में आवश्यकता के अनुसार सिंचाई करने से जल उपयोग की दक्षता बढ़ती है और पौधों की वृद्धि अधिक संतुलित होती है। इससे खेत के पोषक तत्वों का नुकसान भी कम होता है।

फसल चक्र और ड्रिप सिंचाई से बढ़ेगी दक्षता

विशेषज्ञों का कहना है कि धान के बाद मक्का, दलहन या तिलहन जैसी कम पानी वाली फसलों को अपनाने से जल उपयोग में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। फसल चक्र अपनाने से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है, भूमि की उत्पादक क्षमता बढ़ती है तथा कीट एवं रोगों का प्रकोप भी कम होता है। इससे किसानों को दीर्घकालिक आर्थिक लाभ भी मिलता है।

ड्रिप सिंचाई प्रणाली भी पानी बचाने का एक प्रभावी विकल्प बनकर उभरी है। इस तकनीक में पानी सीधे पौधों की जड़ों तक नियंत्रित मात्रा में पहुंचाया जाता है, जिससे पानी की बर्बादी रुकती है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार ड्रिप सिंचाई से 30 से 50 प्रतिशत तक पानी की बचत संभव है। साथ ही उर्वरकों का उपयोग भी अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है, जिससे खेती की लागत कम होती है और उत्पादन क्षमता बढ़ती है।

किसानों को मिल रहे सकारात्मक परिणाम

कांकेर जिले के किसान जनता राम नेताम ने बताया कि पानी की कमी के कारण पहले वे अपनी पूरी कृषि भूमि में खेती नहीं कर पाते थे। सीमित जल उपलब्धता के कारण फसल उत्पादन भी प्रभावित होता था। लेकिन ड्रिप सिंचाई पद्धति अपनाने के बाद अब वे कम पानी में भी सफलतापूर्वक खेती कर रहे हैं। उनका कहना है कि टपक सिंचाई से न केवल पानी की बचत हुई है बल्कि फसल की गुणवत्ता और उत्पादन में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है।

कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि किसान आधुनिक सिंचाई तकनीकों, वैज्ञानिक फसल प्रबंधन और जल संरक्षण उपायों को अपनाएं तो बदलती जलवायु परिस्थितियों में भी कम पानी में बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इससे कृषि क्षेत्र को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाया जा सकेगा तथा भविष्य में बढ़ते जल संकट का प्रभाव भी कम किया जा सकेगा।

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