सीजी भास्कर, 05 जून। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी सरकारी नौकरी में है और उसकी आय पति से अधिक है, तब भी उसे मुकदमे की पैरवी के लिए आवश्यक खर्च प्राप्त करने का अधिकार है। अदालत ने कहा कि यात्रा, भोजन और अदालत में उपस्थित होने से जुड़े खर्च मुकदमे में प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए जरूरी हैं। (Wife’s legal expenses)
पति ने आय का हवाला देकर किया था विरोध : Wife’s legal expenses
मामला अंबिकापुर निवासी आशीष राय और विश्रामपुर निवासी अंजलि राय के बीच चल रहे वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। पति ने सूरजपुर कुटुंब न्यायालय में तलाक की याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग की।पति ने आरटीआई से प्राप्त दस्तावेज पेश करते हुए बताया कि पत्नी सरकारी शिक्षिका है और उसे 71,482 रुपये मासिक वेतन मिलता है, जबकि वह स्वयं संविदा आयुष चिकित्सा अधिकारी के रूप में लगभग 25,700 रुपये प्रतिमाह कमाता है। इसी आधार पर उसने किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता देने का विरोध किया।
कुटुंब न्यायालय ने दिया था आंशिक राहत का आदेश
सूरजपुर कुटुंब न्यायालय ने माना कि पत्नी स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम है, इसलिए उसे मासिक गुजारा भत्ता नहीं दिया जा सकता। हालांकि अदालत ने मुकदमे की पैरवी के लिए 3,000 रुपये एकमुश्त अदालती खर्च तथा प्रत्येक सुनवाई के लिए यात्रा और भोजन व्यय के मद में 1,000 रुपये देने का आदेश पारित किया था।
हाईकोर्ट ने कहा- मुकदमे में शामिल होने का खर्च अलग अधिकार
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की खंडपीठ ने पति की अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि वैवाहिक मामलों में पक्षकारों को बार-बार अदालत आना-जाना पड़ता है, जिससे यात्रा और अन्य खर्च होना स्वाभाविक है।अदालत ने स्पष्ट किया कि यह राशि जीवन-यापन के लिए नहीं, बल्कि मुकदमे में प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए दी जाती है। इसलिए केवल इस आधार पर कि पत्नी की आय अधिक है, उसे मुकदमे के खर्च से वंचित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने खर्च की राशि को बताया उचित : Wife’s legal expenses
हाईकोर्ट ने कहा कि 3,000 रुपये एकमुश्त और 1,000 रुपये प्रति सुनवाई के हिसाब से दिया गया खर्च न तो अत्यधिक है और न ही अनुचित। पति यह साबित करने में भी असफल रहा कि इससे उस पर कोई असहनीय आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
अपील खारिज, निचली अदालत का आदेश बरकरार : Wife’s legal expenses
खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि कुटुंब न्यायालय का आदेश न्यायसंगत, विवेकपूर्ण और कानून के अनुरूप है। आदेश में किसी प्रकार की वैधानिक या क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि नहीं पाई गई। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पति की अपील को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया और निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा।




