सीजी भास्कर, 12 अगस्त। जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े नकदी प्रकरण में बुधवार को बड़ा घटनाक्रम (Yashwant Varma) सामने आया। जांच समिति ने उनके खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों को सिद्ध पाया है। 12 अगस्त 2026 को समिति की रिपोर्ट लोकसभा में पेश की गई। मामला मार्च 2025 में उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास में आग लगने के बाद स्टोररूम से जली हुई नकदी मिलने के बाद सामने आया था।
इस मामले ने न्यायपालिका में जवाबदेही और जांच की प्रक्रिया को लेकर भी कई सवाल खड़े किए हैं। जस्टिस वर्मा ने अप्रैल 2026 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन उनके इस्तीफे के बावजूद जांच समिति ने अपनी प्रक्रिया जारी रखी और 18 मई 2026 को रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दी थी। अब रिपोर्ट संसद के सामने आने के बाद आगे की प्रक्रिया को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

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सरकारी आवास में जली नकदी से शुरू हुआ मामला Yashwant Varma
14 मार्च 2025 की रात दिल्ली स्थित जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास में आग लग गई थी। आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को परिसर के एक स्टोररूम में जली और अधजली नकदी मिली थी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट और फिर संसदीय जांच की प्रक्रिया तक पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2025 में आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की थी। बाद में लोकसभा अध्यक्ष ने Judges Inquiry Act के तहत अलग जांच समिति गठित की, जिसने मामले से जुड़े आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच की।
पहला आरोप नकदी का संतोषजनक जवाब नहीं
जांच में सामने आए पहले आरोप का संबंध सरकारी आवास के स्टोररूम से मिली नकदी से था। समिति के अनुसार जस्टिस वर्मा नकदी की मौजूदगी, उसके स्रोत और स्वामित्व को लेकर संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके।
समिति ने इस आरोप को सिद्ध माना है। इसी नकदी बरामदगी ने पूरे मामले को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया था और उनकी न्यायिक भूमिका पर भी सवाल उठे थे।
दूसरा आरोप साक्ष्यों के संरक्षण में लापरवाही
दूसरे आरोप में मामले से जुड़े भौतिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने में कथित लापरवाही की जांच की गई। समिति के अनुसार स्टोररूम की स्थिति में कानूनी सीलिंग और निरीक्षण से पहले बदलाव किए गए थे।
कुछ करेंसी नोटों के गायब या उपलब्ध नहीं होने को लेकर भी स्पष्ट जवाब नहीं मिला। समिति ने इसे साक्ष्यों के संरक्षण में गंभीर कमी माना। हालांकि इस निष्कर्ष का मतलब यह नहीं है कि समिति ने जस्टिस वर्मा पर स्वयं नोट हटाने का आरोप लगाया है।
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तीसरा आरोप जवाब को लेकर Yashwant Varma
तीसरे आरोप का संबंध जस्टिस वर्मा की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण से था। समिति ने विशेष रूप से 22 मार्च 2025 को दिए गए उनके जवाब को संतोषजनक नहीं माना।
समिति के अनुसार उनका जवाब टालमटोल वाला था और मामले में अपेक्षित स्पष्टता तथा संस्थागत जिम्मेदारी के अनुरूप नहीं था। उपलब्ध दस्तावेजों और गवाहों के बयानों के आधार पर समिति ने इस आरोप को भी सिद्ध माना है।
इस्तीफे के बाद भी जारी रही जांच
जस्टिस वर्मा ने 9 अप्रैल 2026 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा भेजा था और पद से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा देने की बात कही थी। इसके बाद माना जा रहा था कि उनके खिलाफ चल रही संसदीय जांच समाप्त हो जाएगी।
हालांकि लोकसभा अध्यक्ष की ओर से गठित समिति ने अपनी जांच पूरी की और 18 मई को रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दी। लोकसभा सचिवालय के अनुसार रिपोर्ट Judges Inquiry Act, 1968 के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार पेश की गई थी।
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अब आगे क्या होगा
12 अगस्त को रिपोर्ट लोकसभा में पेश होने के बाद अब मामला संसद के रिकॉर्ड (Yashwant Varma) में आ गया है। जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के कारण उनके खिलाफ पद से हटाने की महाभियोग प्रक्रिया को लेकर संवैधानिक और कानूनी सवाल बने हुए हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस्तीफे के बाद उन्हें पद से हटाने के लिए महाभियोग का व्यावहारिक आधार नहीं रह जाता, जबकि रिपोर्ट को संसद के सामने रखना जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
इस मामले की खास बात यह भी है कि जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के बाद भी संसदीय जांच पूरी हुई और समिति ने तीनों आरोपों को सिद्ध माना। अब रिपोर्ट में सामने आए निष्कर्षों और आगे की संसदीय कार्रवाई पर सबकी नजर रहेगी।
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