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Home » हथियार जो थे माओवादियों की ताकत, अब बन रहे सबूत-बस्तर में लाल नेटवर्क की कमर टूटने लगी

हथियार जो थे माओवादियों की ताकत, अब बन रहे सबूत-बस्तर में लाल नेटवर्क की कमर टूटने लगी

By Newsdesk Admin
21/04/2026
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सीजी भास्कर, 21 अप्रैल |

Contents
  • हथियारों पर वार, माओवादियों पर करारा असर
  • छिपे हथियारों की खोज, कमजोर होता नेटवर्क

जगदलपुर। बस्तर कभी माओवादी गतिविधियों का मजबूत गढ़ माना जाता था, जहां घने जंगल और दुर्गम पहाड़ियां उन्हें सुरक्षित ठिकाना देती थीं। इन्हीं इलाकों से PLGA बटालियन अपने हथियारबंद कैडरों के दम पर बड़े हमलों को अंजाम देती थी और वर्षों तक बंदूक, बारूद व आधुनिक हथियारों के सहारे दहशत कायम रखी गई। हालांकि अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। जिन हथियारों के दम पर माओवादी अपनी ताकत दिखाते थे, वही अब सुरक्षा बलों के कब्जे में पहुंच रहे हैं। लगातार हो रही बरामदगी इस बात का संकेत है कि बस्तर में माओवादी नेटवर्क धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जा रहा है।

हथियारों पर वार, माओवादियों पर करारा असर

बस्तर में माओवाद खत्म करने के लिए सुरक्षा बलों की रणनीति अब केवल ऑपरेशन तक सीमित नहीं है, बल्कि माओवादियों की सैन्य ताकत को पूरी तरह खत्म करने पर फोकस किया जा रहा है। लगातार सर्चिंग अभियान, मुठभेड़ और अंदरूनी इलाकों में दबिश के दौरान बड़ी संख्या में हथियार बरामद किए जा रहे हैं। कई मुठभेड़ों में जवानों ने AK-47, INSAS, SLR और अन्य अत्याधुनिक हथियार जब्त किए हैं। वहीं आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली भी अपने साथ हथियार सौंप रहे हैं। इससे साफ है कि संगठन के भीतर मनोबल टूट रहा है, और हथियारों की पकड़ ढीली पड़ चुकी है

छिपे हथियारों की खोज, कमजोर होता नेटवर्क

सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती जंगलों में छिपाए गए हथियारों के डंप को खोज निकालना भी है। माओवादी वर्षों से जमीन के भीतर, गुफाओं में और जंगलों के गुप्त ठिकानों में हथियार छिपाकर रखते थे। अब लगातार इन डंप स्थलों को खोजा जा रहा है। हर बरामद हथियार केवल एक सामान नहीं, बल्कि माओवादी नेटवर्क के कमजोर होने का प्रमाण माना जा रहा है। सुरक्षा बलों का दावा है कि हथियारों की कमी संगठन की हमलावर क्षमता को सीधे प्रभावित कर रही है।

आंकड़ों की बात करें तो प्रदेश गठन के बाद से अब तक बस्तर में साढ़े तीन हजार से ज्यादा हथियार बरामद किए जा चुके हैं। यह आंकड़ा बताता है कि वर्षों से कितनी बड़ी मात्रा में हथियार माओवादियों के पास जमा थे। साल 2020 में 89, 2021 में 80, 2022 में 61, 2023 में 35, 2024 में 286, 2025 में रिकॉर्ड 677 और साल 2026 में अब तक 316 हथियार बरामद किए जा चुके हैं। यानी पिछले दो वर्षों में रिकवरी का ग्राफ तेजी से बढ़ा है, जो सुरक्षा बलों की बढ़ती पकड़ को दर्शाता है।

माओवादियों के पास कभी AK-47, INSAS, SLR, LMG, BGL जैसे हथियार बड़ी संख्या में हुआ करते थे। इन हथियारों के दम पर घात लगाकर हमला, कैंप पर फायरिंग और बड़े एंबुश को अंजाम दिया जाता था। लेकिन अब लगातार रिकवरी और ऑपरेशन के बाद यह जखीरा लगभग खत्म होने की स्थिति में पहुंच चुका है। हथियारों की कमी माओवादी संगठन की सबसे बड़ी कमजोरी बनती जा रही है। सबसे ज्यादा करेगुट्टा ऑपरेशन KGF में नक्सलियों का आधुनिक हथियार मैन्युफैक्चरिंग मशीनें बरामद किया गया था. उस वक्त से ही नक्सलियों का हौसला पूरी तरह टूट गया और मुख्यधारा में जुड़ने का सिलसिला शुरू हुआ।

जानकारों के मुताबिक, माओवादियों के पास मौजूद अधिकतर हथियार लूट, तस्करी और अवैध निर्माण के जरिए जुटाए गए थे। साल 2004 में उड़ीसा के कोरापुट शस्त्रागार लूटकांड से बड़ी मात्रा में हथियार हाथ लगे थे। वहीं बस्तर में कई बड़े हमलों के बाद शहीद जवानों से भी हथियार लूटे गए। 2007 का रानीबोदली हमला और 2010 का ताड़मेटला कांड इसके बड़े उदाहरण रहे। इसके अलावा माओवादी अपनी फैक्ट्रियों में कट्टा, सिंगल शॉट गन और BGL जैसे हथियार भी तैयार करते थे। लेकिन अब सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई से तेलंगाना, महाराष्ट्र , आंध्रप्रदेश में नक्सली हथियारों को सरेंडर कर रहे हैं और नक्सलियों द्वारा लिए सभी हथियार लगभग वापस आ चुका है। यह पूरा तंत्र बिखरता नजर आ रहा है। कभी दहशत का प्रतीक रहे हथियार अब माओवादी पतन की कहानी कह रहे हैं।

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