सीजी भास्कर, 2 जुलाई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नार्को टेस्ट (Narco Test Consent) को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध नार्को टेस्ट, पॉलीग्राफ टेस्ट और ब्रेन मैपिंग जैसी वैज्ञानिक जांच तकनीकों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। ऐसी किसी भी जांच से पहले संबंधित व्यक्ति की पूर्ण, स्वैच्छिक और सूचित सहमति लेना अनिवार्य होगा।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि जांच एजेंसियां केवल कानूनी प्रक्रिया और निर्धारित सुरक्षा उपायों का पालन करने के बाद ही इस तरह की जांच करा सकती हैं। बिना सहमति किसी भी व्यक्ति को नार्को, पॉलीग्राफ या ब्रेन मैपिंग टेस्ट के लिए बाध्य करना कानून के अनुरूप नहीं होगा।
हत्या के मामले की सुनवाई के दौरान आया फैसला
मामला रायगढ़ जिले के चक्रधरनगर थाना क्षेत्र में दर्ज हत्या और साक्ष्य छिपाने के एक प्रकरण से जुड़ा है। पुलिस ने जांच के दौरान लक्ष्मीनारायण पटेल और अर्धना भगत को संदेही मानते हुए पूछताछ के लिए बुलाया था। दोनों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि उनका नाम न तो एफआईआर में दर्ज है और न ही उनके खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य मौजूद है।
याचिकाकर्ताओं (Narco Test Consent) का आरोप था कि पुलिस ने उन्हें बिना किसी वैधानिक नोटिस के लगातार 18 दिनों तक थाने बुलाया, लंबे समय तक हिरासत में रखा और बिना निर्धारित प्रक्रिया अपनाए उनके मोबाइल फोन जब्त कर लिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें रायपुर ले जाकर बिना सहमति और बिना न्यायिक अनुमति के नार्को टेस्ट और ब्रेन मैपिंग कराने के लिए दबाव बनाया गया।
हाईकोर्ट ने जारी किए स्पष्ट दिशा-निर्देश
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट (Narco Test Consent) ने मामले के तथ्यों पर कोई टिप्पणी किए बिना जांच एजेंसियों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए। कोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को वैज्ञानिक जांच के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। ऐसी जांच केवल तभी होगी जब संबंधित व्यक्ति अपनी स्वतंत्र इच्छा से, पूरी जानकारी के साथ सहमति प्रदान करे।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि जांच एजेंसी नार्को टेस्ट या पॉलीग्राफ टेस्ट कराने का प्रस्ताव रखती है, तो संबंधित व्यक्ति की सहमति सक्षम न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराई जाएगी। मजिस्ट्रेट यह सुनिश्चित करेंगे कि सहमति किसी दबाव, भय या प्रलोभन के बिना स्वेच्छा से दी गई है।
‘सेल्वी’ फैसले और NHRC गाइडलाइन का पालन अनिवार्य
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य (Selvi Case) के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि जांच एजेंसियों को उसी के अनुरूप कार्रवाई करनी होगी। साथ ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की गाइडलाइन और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita – BNSS) में निर्धारित सभी सुरक्षा प्रावधानों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य होगा।
निजता और संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा को मिली मजबूती
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह फैसला व्यक्ति की निजता, गरिमा और संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत आत्म-अभिशंसन से संरक्षण के अधिकार को और अधिक मजबूत करता है। इस निर्णय के बाद जांच एजेंसियों के लिए किसी भी संदेही या आरोपी पर नार्को टेस्ट, पॉलीग्राफ टेस्ट या ब्रेन मैपिंग कराने से पहले न्यायिक प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य होगा।



