सीजी भास्कर, 26 जुलाई : छत्तीसगढ़ में वन विभाग ने 10 वन मंडलों में 51 लाख से अधिक क्लोनल यूकेलिप्टस (नीलगिरी) पौधों के रोपण की तैयारी शुरू कर दी है। इसके लिए करीब 4.09 करोड़ रुपये के टेंडर जारी किए गए हैं। बड़े पैमाने पर यूकेलिप्टस रोपण की योजना को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञों और वन क्षेत्र से जुड़े जानकारों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि प्रदेश में फलदार और छायादार वृक्षों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। (Eucalyptus Plantation)
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10 वन मंडलों में लगाए जाएंगे 51 लाख पौधे
वन विभाग के अनुसार अनुसंधान एवं विस्तार मंडल जगदलपुर, बस्तर, धमतरी, महासमुंद, पूर्व भानुप्रतापपुर, केशकाल, सुकमा, दंतेवाड़ा, बीजापुर और बालोद वन मंडलों के लिए 51.07 लाख क्लोनल यूकेलिप्टस पौधों (Eucalyptus Plantation) की खरीद प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इनमें सबसे अधिक पौधे अनुसंधान एवं विस्तार मंडल जगदलपुर और बस्तर वन मंडल में लगाए जाने का प्रस्ताव है।

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विशेषज्ञ बोले- फलदार और छायादार पेड़ों को मिले प्राथमिकता
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदेश में बड़े स्तर पर पौधरोपण की जरूरत है, लेकिन यूकेलिप्टस की बजाय ऐसे वृक्ष लगाए जाने चाहिए जो भूजल स्तर और मिट्टी की उर्वरता पर प्रतिकूल प्रभाव न डालें। उनका मानना है कि फलदार और छायादार पेड़ पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ जैव विविधता को बढ़ावा देते हैं और स्थानीय समुदायों के लिए भी अधिक उपयोगी साबित होते हैं।
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वन विभाग ने बताया क्यों चुना यूकेलिप्टस
वन विभाग का कहना है कि यूकेलिप्टस तेजी से बढ़ने वाला वृक्ष है और पेपर व प्लाईवुड उद्योग में इसकी लगातार मांग बनी रहती है। विभाग के अनुसार कम उपजाऊ और अनुपयोगी भूमि पर इसकी खेती किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत बन सकती है। बस्तर क्षेत्र में कई किसान पिछले कुछ वर्षों से यूकेलिप्टस का रोपण कर आर्थिक लाभ भी कमा रहे हैं।
जलभराव वाले क्षेत्रों में भी बताया उपयोगी
वन विशेषज्ञों के अनुसार यूकेलिप्टस जलभराव वाले क्षेत्रों में बायोड्रेनेज के रूप में उपयोगी हो सकता है, क्योंकि इसकी गहरी जड़ें अतिरिक्त पानी को सोखने में सक्षम होती हैं। हालांकि उन्होंने यह भी सलाह दी है कि यूकेलिप्टस को कृषि फसलों से पर्याप्त दूरी पर लगाया जाए, ताकि मिट्टी की उर्वरता और अन्य फसलों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
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4.09 करोड़ के टेंडर पर तेज हुई बहस
प्रदेश में 51 लाख से अधिक यूकेलिप्टस पौधों की खरीद और 4.09 करोड़ रुपये के टेंडर जारी होने के बाद इस योजना को लेकर बहस तेज हो गई है। एक ओर वन विभाग इसे वानिकी और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बता रहा है, वहीं पर्यावरण विशेषज्ञ इसे लेकर सावधानी बरतने और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप मिश्रित पौधरोपण को प्राथमिकता देने की मांग कर रहे हैं।
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