सीजी भास्कर, 31 जुलाई। बेमेतरा में आयोजित Chaturmasya व्रत के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सनातन परंपरा में चातुर्मास्य के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं और इस अवधि में संपूर्ण सृष्टि के पालन-पोषण का दायित्व भगवान शिव निभाते हैं।
उन्होंने श्रद्धालुओं से सावन मास में भगवान शिव की आराधना, नियमित जीवनचर्या और आध्यात्मिक साधना अपनाने का आह्वान किया।

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चातुर्मास्य का बताया आध्यात्मिक महत्व Chaturmasya
अपने प्रवचन में शंकराचार्य ने कहा कि चातुर्मास केवल वर्षा ऋतु का समय नहीं है, बल्कि यह आत्मचिंतन, साधना और ज्ञान प्राप्ति का महत्वपूर्ण अवसर भी है।
उन्होंने कहा कि इस अवधि में धार्मिक अनुशासन और आध्यात्मिक अभ्यास का विशेष महत्व होता है।
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भगवान सूर्य की दिनचर्या का किया उल्लेख
प्रवचन के दौरान भगवान सूर्य की नियमित दिनचर्या और विप्र-सम्मान का भी उल्लेख किया गया। उन्होंने कहा कि यही अनुशासन और सम्मान उनके तेज का आधार माना जाता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से भी अनुशासित जीवन और धर्म के मूल्यों का पालन करने की अपील की।
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हरीश्वर कथा का हो रहा वाचन
आयोजन के दौरान हरीश्वर कथा का वाचन किया जा रहा है। साथ ही प्रतिदिन भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों और लीलाओं पर प्रवचन आयोजित किए जा रहे हैं।
इस धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में संत, ब्रह्मचारी और श्रद्धालु शामिल होकर धर्म लाभ प्राप्त कर रहे हैं।
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