सीजी भास्कर, 11 अक्टूबर : दिल्ली के जंतर-मंतर पर 10 अक्टूबर को हुए प्रदर्शन (CJP Protest Supreme Court Hearing) से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। इन याचिकाओं में नेताओं और वकीलों की कथित गैरकानूनी हिरासत, पुलिस की कार्रवाई, मेट्रो स्टेशन बंद करने और इंटरनेट सेवाएं रोकने पर सवाल उठाए गए हैं। सुनवाई के दौरान कोर्टरूम में वकीलों और पुलिस अधिकारियों के बीच बहस भी हुई।
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कोर्टरूम में बहस
सुनवाई के दौरान वकीलों ने आरोप लगाया कि 10 अक्टूबर को प्रदर्शन के समय पुलिस ने वकीलों के साथ मारपीट की। कथित पिटाई का शिकार हुए कुछ वकील भी अदालत में पेश हुए। कोर्टरूम में पुलिसकर्मियों के बैठने की व्यवस्था को लेकर भी आपत्ति जताई गई।
इसी बीच कोर्टरूम नंबर 18 में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग लिंक काम नहीं करने का मुद्दा उठा। वकीलों ने कोर्टरूम बदलने या लिंक तत्काल ठीक कराने की मांग की। उनका कहना था कि वरिष्ठ अधिवक्ता केके वेणुगोपाल को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होना है। वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने भी इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि बाहर यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि किसी एक पक्ष का समर्थन किया जा रहा है। यह घटनाक्रम (CJP Protest Supreme Court Hearing) के दौरान अदालत में सामने आया।
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इंटरनेट बंद करने पर सवाल
प्रदर्शन के दौरान इंटरनेट सेवाएं बंद किए जाने के मामले में अधिवक्ता एनके गोस्वामी ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत जनहित याचिका दायर की है। याचिका में डिजिटल संचार सेवाएं बंद करने की कार्यपालिका की शक्ति पर सवाल उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ता ने केंद्रीय गृह सचिव के मूल आदेश, इंटरनेट बंद करने के दर्ज कारणों, कम प्रतिबंधात्मक विकल्पों पर विचार और कानूनी समीक्षा की कार्यवाही का विवरण सार्वजनिक करने की मांग की है। इस याचिका (CJP Protest Supreme Court Hearing) में इंटरनेट बंद करने के फैसले की वैधानिकता और प्रक्रिया से जुड़े सवाल उठाए गए हैं।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि अदालत के सामने दो मामले हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि कुछ वकील उन मामलों का उल्लेख करना चाहते हैं, जो सुनवाई की सूची में शामिल नहीं हैं। अदालत ने अवमानना याचिका की सुनवाई सोमवार तक टालने या दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर संबंधित मामलों को एक साथ जोड़ने के विकल्प रखे।
हिरासत पर उठे सवाल
10 अक्टूबर के प्रदर्शन के बाद सुप्रीम कोर्ट में चार से अधिक याचिकाएं दायर किए जाने की बात सामने आई है। इनमें राजनीतिक नेताओं, वकीलों और आम लोगों को कथित तौर पर गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लेने के आरोप शामिल हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने राजनीतिक नेताओं और वकीलों की कथित हिरासत का मुद्दा उठाया। मनोज कुमार झा की याचिका में बड़े पैमाने पर हिरासत और पुलिस की कार्रवाई पर सवाल किए गए हैं। इसमें आरोप लगाया गया है कि कुछ नेताओं को उनके घरों से बाहर निकलने से भी रोका गया।
वकील अमन प्रसाद की याचिका में वकीलों और मीडियाकर्मियों के साथ कथित मारपीट और हिरासत का मामला उठाया गया है। याचिका में प्रदर्शन स्थल से दूर के इलाकों में आम लोगों को हिरासत में लिए जाने का आरोप भी है। इन आरोपों पर अदालत में सुनवाई जारी है और इन्हें अभी याचिकाकर्ताओं के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
मेट्रो स्टेशन बंद करने का मामला
दिल्ली मेट्रो के स्टेशन बंद रखने का मामला भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने इस संबंध में अवमानना याचिका दायर की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद कई मेट्रो स्टेशनों के गेट बंद रखे गए।
इससे पहले 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सुरक्षा के नाम पर सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह बंद नहीं किया जाना चाहिए। प्रशासन व्यवस्था नियंत्रित कर सकता है, लेकिन आम यात्रियों, छात्रों और कामगारों की आवाजाही बाधित नहीं होनी चाहिए।
परिवहन से जुड़े एक संगठन ने भी सड़कें बंद होने से परिवहन सेवाओं और कारोबार पर असर पड़ने का मुद्दा उठाया है। फिलहाल अदालत में पुलिस की कार्रवाई, कथित हिरासत और सार्वजनिक परिवहन पर पाबंदियों से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई जारी है। मामले (CJP Protest Supreme Court Hearing) में अदालत का अंतिम फैसला आना बाकी है।



