सीजी भास्कर, 1 नवंबर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि जबरन या प्रलोभन देकर कराए जा रहे धर्म परिवर्तन (Forced Conversion Case Chhattisgarh) को रोकने के लिए ग्राम सभाओं द्वारा लगाए गए होर्डिंग्स को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे बोर्ड जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक विरासत और स्वशासन की रक्षा के उद्देश्य से लगाए गए हैं और यह संविधान की पांचवीं अनुसूची (Fifth Schedule of the Constitution) के अनुरूप हैं।
यह मामला कांकेर जिले का है, जहां ग्राम सभाओं ने अपने क्षेत्रों में पादरियों और मतांतरित ईसाइयों के प्रवेश पर रोक लगाने वाले होर्डिंग्स (Anti-Conversion Hoardings) लगाए थे। इन बोर्ड्स पर लिखा था “हमारे गांव में जबरन धर्म परिवर्तन करने वालों का प्रवेश वर्जित है।” इस पर दिगबाल टांडी नामक याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल कर कहा कि यह ईसाई समुदाय को मुख्यधारा से अलग करने और उनके मौलिक अधिकारों का हनन है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति विभू दत्त गुरु की खंडपीठ ने 28 अक्टूबर को इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि ग्राम सभाओं ने ये होर्डिंग्स अपने पारंपरिक अधिकारों और जनजातीय संस्कृति की रक्षा के लिए लगाए हैं। अदालत ने कहा कि जबरन धर्म परिवर्तन गंभीर चिंता का विषय है, और इसे रोकने के लिए ऐसे कदम जरूरी हैं। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि अगर ऐसे उपाय न किए जाएं तो जनजातीय समाज की परंपराएं और सामाजिक एकता पर विपरीत असर पड़ सकता है।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि इन होर्डिंग्स में न तो किसी समुदाय के प्रति घृणा का संदेश है और न ही यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) या अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन करता है। बल्कि ये ग्राम सभाओं के उस अधिकार का हिस्सा हैं, जो उन्हें संविधान की पांचवीं अनुसूची और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA Act) के तहत मिला है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि धर्म परिवर्तन व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विषय है, लेकिन जब वह प्रलोभन, धोखे या दबाव के तहत किया जाए, तो वह संविधान की भावना के खिलाफ है। ग्राम सभाओं द्वारा ऐसे कदम उठाना उनके अधिकार क्षेत्र में आता है, ताकि समाज में संतुलन और सांस्कृतिक सुरक्षा बनी रहे।
जानकारी के मुताबिक, कांकेर जिले के 12 गांवों में अब तक ऐसे होर्डिंग्स लगाए गए हैं, जिनमें बाहरी प्रचारकों को गांव की सीमाओं में प्रवेश न करने की चेतावनी दी गई है। ग्रामीणों ने अदालत में बताया कि यह कदम नफरत फैलाने के लिए नहीं बल्कि अपने पारंपरिक जीवन और धर्म-संस्कृति की रक्षा के लिए उठाया गया है।
हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि ऐसे बोर्ड संविधान-विरोधी नहीं हैं और इन्हें हटाने का कोई कारण नहीं बनता। अदालत ने राज्य सरकार को भी सलाह दी कि जबरन मतांतरण की घटनाओं पर निगरानी रखी जाए और अगर किसी व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता बाधित हो रही हो तो उसके लिए अलग से कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाए।


