Bastar Maoist News : छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में दशकों से जारी माओवादी संघर्ष अब अपने सबसे कमजोर दौर में पहुंच गया है। सुरक्षा बलों के कड़े प्रहार और ‘नियद नेल्लांआर’ (आपका अच्छा गांव) जैसी विकास योजनाओं के असर से माओवादियों का आधार इलाका तेजी से सिमट रहा है। पुलिस के दावों के मुताबिक, बस्तर में माओवादी नेटवर्क अब बिखरने की कगार पर है, लेकिन कुछ कट्टर कैडर अब भी चुनौती बने हुए हैं।
केवल सीमावर्ती इलाकों तक सीमित सक्रियता
सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट के अनुसार, माओवादियों की धमक अब केवल कुछ चुनिंदा पॉकेट्स तक ही रह गई है:
- प्रभावित क्षेत्र: बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर और कांकेर के घने जंगलों वाले सीमावर्ती इलाके।
- बदली स्थिति: हाल ही में कई बड़े कमांडरों और जमीनी कैडरों के आत्मसमर्पण के बाद संगठन का ढांचा चरमरा गया है।
- अंडरग्राउंड चुनौती: संगठन के 5 प्रमुख बड़े नाम अब भी अंडरग्राउंड रहकर अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, जो सुरक्षा बलों के लिए ऑपरेशन का मुख्य केंद्र हैं।
पुलिस का ‘अल्टीमेटम’: मुख्यधारा या सख्त कार्रवाई
बस्तर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट और सख्त संदेश जारी किया है। उन्होंने कहा है कि जो भी माओवादी अब भी जंगलों में छिपे हैं, उनके पास आत्मसमर्पण करने का यह अंतिम अवसर है।
“बस्तर में माओवाद का ढांचा लगभग ध्वस्त हो चुका है। अब निर्णायक कार्रवाई का समय है। यदि वे हथियार नहीं डालते हैं, तो सुरक्षा बल अपने ऑपरेशन्स को और अधिक आक्रामक बनाएंगे।”
पड़ोसी राज्यों का भी बढ़ता दबाव
बस्तर के साथ-साथ तेलंगाना पुलिस ने भी अपने क्षेत्र के मूल माओवादियों से अपील की है कि वे हिंसा का रास्ता छोड़ मुख्यधारा में लौटें। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि भर्ती में भारी गिरावट आई है और पुराने सदस्य भी अब संगठन का साथ छोड़ रहे हैं।
निर्णायक मोड़ पर बस्तर
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बस्तर में अब माओवाद के खिलाफ लड़ाई अपने निर्णायक मोड़ पर है। सुरक्षा बलों द्वारा “सर्जिकल स्ट्राइक” जैसे ऑपरेशन्स और अंदरूनी इलाकों में नए कैंपों की स्थापना ने माओवादियों की रसद और सूचना तंत्र को काट दिया है। अब देखना यह है कि बचे हुए 5 बड़े चेहरे आत्मसमर्पण का रास्ता चुनते हैं या अंतिम मुकाबले की ओर बढ़ते हैं।


