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Bastar Peace Process : बदलता बस्तर, संवरता छत्तीसगढ़: साय सरकार में शांति, विश्वास और विकास का नया अध्याय

By Newsdesk Admin
13/02/2026
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Bastar Peace Process
Bastar Peace Process

सीजी भास्कर, 13 फरवरी | कभी भय, बंदूक और सन्नाटे की पहचान रहा बस्तर आज उम्मीद, विश्वास और बदलाव की नई कहानी (Bastar Peace Process) लिख रहा है। दशकों तक नक्सल हिंसा से जूझता रहा यह अंचल अब शांति की ओर निर्णायक कदम बढ़ा चुका है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि इसके पीछे मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, संवेदनशील प्रशासन और सुरक्षा बलों के समन्वित प्रयासों की लंबी प्रक्रिया रही है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार ने जिस दृढ़ता से बस्तर में शांति बहाली की दिशा में काम किया है, वह पूरे राज्य के लिए आशा का केंद्र बन गया है।

Contents
  • धुर नक्सल प्रभावित गांवों में पहली बार लहराया तिरंगा
  • नक्सलवाद उन्मूलन अभियान: सुरक्षा नहीं, मानवता की जीत
  • विकास की धारा सुदूर गांवों तक
  • ‘नियद नेल्ला नार’: भरोसे की योजना
  • अर्थव्यवस्था, संस्कृति और पहचान का पुनर्जागरण
  • बंदूक नहीं, किताब और तरक्की की आवाज़

धुर नक्सल प्रभावित गांवों में पहली बार लहराया तिरंगा

बस्तर संभाग के 29 ऐसे गांव, जहां आज़ादी के बाद कभी राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराया (Bastar Peace Process) जा सका था, वहां अब तिरंगा गर्व से लहरा रहा है। यह केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की वास्तविक विजय का प्रतीक है। जिन इलाकों में कभी तिरंगा फहराना भी जोखिम भरा था, वहां आज राष्ट्रीय पर्व पूरे सम्मान और उत्साह के साथ मनाए जा रहे हैं। यह संभव हुआ सुरक्षा शिविरों की स्थापना, सड़क और संचार नेटवर्क के विस्तार तथा प्रशासन की सीधी और प्रभावी पहुंच से।

नक्सलवाद उन्मूलन अभियान: सुरक्षा नहीं, मानवता की जीत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के स्पष्ट संकल्प के अनुरूप मुख्यमंत्री साय ने बस्तर में “सुरक्षा, विकास और विश्वास” की नीति लागू की। इसका परिणाम अब जमीन पर दिखने लगा है। सुकमा जिले में 64 लाख रुपये के इनामी 26 हार्डकोर माओवादियों का आत्मसमर्पण इस बदलाव का बड़ा उदाहरण है।

जगदलपुर में आयोजित “पूना मारगेम: पुनर्वास से पुनर्जीवन” कार्यक्रम में 210 नक्सलियों का सामूहिक आत्मसमर्पण ऐतिहासिक क्षण रहा। मुख्यमंत्री ने इसे अपने सार्वजनिक जीवन का सबसे संतोषजनक अनुभव बताया। “नक्सलवादी आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति 2025” और “नियद नेल्ला नार” जैसी योजनाओं ने भटके युवाओं को मुख्यधारा में लौटने का भरोसा दिया है।

पिछले डेढ़ वर्ष में 435 नक्सली मुठभेड़ों में मारे गए, 1,432 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया और 1,457 की गिरफ्तारी यह संकेत देती है कि बस्तर में नक्सलवाद अब अंतिम दौर में है। मुख्यमंत्री साय का लक्ष्य मार्च 2026 तक छत्तीसगढ़ को नक्सल मुक्त बनाना है—और मौजूदा गति से यह लक्ष्य दूर नहीं लगता।

विकास की धारा सुदूर गांवों तक

बस्तर में बदलाव केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है। अबूझमाड़ के दूरस्थ गांव रेकावाया में पहली बार स्कूल (Bastar Peace Process) बन रहा है। हिंसा के कारण बंद पड़े करीब 50 स्कूल फिर से खुल चुके हैं। स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हुआ है और बिजली उन गांवों तक पहुंची है, जहां दशकों से अंधेरा था। बीजापुर के चिलकापल्ली में 77 वर्षों बाद पहली बार बिजली का बल्ब जलना केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि सभ्यता की नई शुरुआत है।

सड़क और रेल परियोजनाओं ने बस्तर को मुख्यधारा से जोड़ दिया है – 275 किमी लंबी 49 सड़कें, 11 नए पुल, केशकाल घाटी का चौड़ीकरण, इंद्रावती नदी पर नया पुल और रावघाट–जगदलपुर रेल लाइन की स्वीकृति ने पूरे क्षेत्र की तस्वीर बदल दी है। 607 मोबाइल टावरों और 4G सेवाओं के विस्तार से डिजिटल क्रांति ने भी रफ्तार पकड़ी है।

‘नियद नेल्ला नार’: भरोसे की योजना

नियद नेल्ला नार योजना के तहत 327 से अधिक गांवों में आधार कार्ड, आयुष्मान कार्ड, राशन कार्ड, प्रधानमंत्री आवास और किसान क्रेडिट कार्ड जैसी सुविधाएं पहुंची हैं। यह योजना अब कागजों तक सीमित नहीं, बल्कि वास्तविक बदलाव का प्रतीक बन चुकी है। पंचायत चुनावों का शांतिपूर्ण आयोजन और पहली बार ध्वजारोहण इस बात का प्रमाण है कि बस्तर में लोकतंत्र की जड़ें गहरी हो रही हैं।

अर्थव्यवस्था, संस्कृति और पहचान का पुनर्जागरण

आर्थिक मोर्चे पर तेंदूपत्ता मानक बोरे की दर 4000 से बढ़ाकर 5500 रुपये करना 13 लाख परिवारों के लिए संजीवनी साबित हुआ। चरण पादुका योजना की वापसी ने संग्राहकों को सम्मान दिया। नई उद्योग नीति 2024–30 में बस्तर के लिए विशेष प्रावधान और 45% पूंजी अनुदान निवेश को आकर्षित कर रहे हैं। नागरनार स्टील प्लांट और नियानार औद्योगिक क्षेत्र बस्तर को औद्योगिक नक्शे पर स्थापित कर रहे हैं।

सांस्कृतिक स्तर पर बस्तर ओलंपिक में 1.65 लाख प्रतिभागियों की भागीदारी और बस्तर पंडुम में 47 हजार कलाकारों की मौजूदगी बताती है कि अब गोलियों की जगह खेल और संस्कृति की गूंज है। बैगा, गुनिया और सिरहा जैसी परंपराओं को सम्मान निधि देकर पहचान दी जा रही है।

बंदूक नहीं, किताब और तरक्की की आवाज़

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का स्पष्ट संदेश (Bastar Peace Process) है – “बस्तर में अब बंदूक की नहीं, किताब और तरक्की की आवाज़ गूंजेगी।” बस्तर फाइटर्स में 3202 पदों का सृजन स्थानीय युवाओं को सुरक्षा के साथ रोजगार भी दे रहा है। बस्तर अब एक नई कहानी लिख रहा है – जहां भय की जगह भरोसा, हिंसा की जगह विकास और निराशा की जगह उम्मीद ने ले ली है।

यह परिवर्तन केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और सामूहिक संकल्प की जीत है—एक ऐसा स्वर्णिम अध्याय, जो आने वाली पीढ़ियों को दिशा देगा।

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