सीजी भास्कर, 22 अप्रैल : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने घर खरीदारों के हितों (RERA Justice Decision) की रक्षा करते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। जस्टिस बीडी गुरु की एकल पीठ ने स्पष्ट किया है कि रेरा (रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी) एक विशेष नियामक संस्था है, न कि कोई पारंपरिक दीवानी अदालत। कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि मकान खरीदारों को रेरा में शिकायत दर्ज कराने के लिए किसी कठोर समय-सीमा (Limitation) में नहीं बांधा जा सकता। यह (RERA Justice Decision) उन हजारों खरीदारों के लिए बड़ी राहत है जिनकी शिकायतें तकनीकी आधार पर खारिज कर दी जाती थीं।
क्या था पूरा मामला
यह मामला जगदलपुर निवासी निधि साव से जुड़ा है, जिन्होंने दुर्ग जिले के अमलेश्वर स्थित ‘ग्रीन अर्थ सिटी’ में एक फ्लैट बुक किया था। बिल्डर द्वारा समय पर कब्जा न देने और निर्माण कार्य की गुणवत्ता खराब होने पर उन्होंने पहले स्थानीय प्रशासन और फिर रेरा का दरवाजा खटखटाया। रेरा ने बिल्डर को दो महीने में काम पूरा करने का आदेश दिया, लेकिन इस फैसले से असंतुष्ट होकर जब याचिकाकर्ता रेरा अपीलीय ट्रिब्यूनल पहुंचीं, तो ट्रिब्यूनल ने “अत्यधिक देरी” का हवाला देते हुए अपील को सुनने से ही इनकार कर दिया। इस (RERA Justice Decision) की आवश्यकता तब पड़ी जब ट्रिब्यूनल के इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि केवल देरी के आधार पर न्याय के दरवाजे बंद करना उचित नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि रेरा अधिनियम की धारा 31 के तहत शिकायत के लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं है। सीमा अधिनियम (Limitation Act) सामान्यतः दीवानी अदालतों पर लागू होता है, लेकिन रेरा जैसे विशेष निकायों पर यह तब तक प्रभावी नहीं होगा जब तक कानून में इसका स्पष्ट प्रावधान न हो।
दोबारा होगी सुनवाई
हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए ट्रिब्यूनल के पुराने आदेश को निरस्त कर दिया है और निर्देश दिया है कि मामले की सुनवाई अब तकनीकी कारणों के बजाय गुण-दोष (Merit) के आधार पर की जाए। इस (RERA Justice Decision) को रियल एस्टेट सेक्टर में जवाबदेही तय करने और ग्राहकों के अधिकारों को मजबूती प्रदान करने वाला एक मील का पत्थर माना जा रहा है।


