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Regularization Rights : तीन दशक पुराने संघर्ष में मजदूरों को मिली राहत, अदालत ने क्यों खारिज की बड़ी दलील

By Newsdesk Admin
22/06/2026
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सीजी भास्कर, 22 जून। करीब तीन दशक से चले आ रहे एक श्रमिक विवाद में हाई कोर्ट के फैसले ने कई कर्मचारियों की उम्मीदों को नया बल दिया है। लंबे समय से अपने अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे श्रमिकों के पक्ष में आए इस निर्णय को श्रम मामलों से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों में माना जा रहा है। अदालत की टिप्पणी के बाद श्रमिक संगठनों के बीच भी इस मामले की चर्चा तेज हो गई है।

Contents
  • 29 साल पुराना है विवाद
  • वर्षों तक करते रहे काम
  • श्रम न्यायालय ने दिया था श्रमिकों के पक्ष में फैसला
  • क्या थी प्रबंधन की दलील
  • अदालत ने क्या कहा
  • नियमितीकरण का रास्ता साफ

मामला केवल कुछ कर्मचारियों तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इससे भविष्य में ऐसे कई मामलों पर असर पड़ सकता है जहां नियमितीकरण को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। अदालत ने तकनीकी आधारों और कर्मचारियों के वास्तविक कार्य स्वरूप को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने भारतीय खाद्य निगम के कैजुअल श्रमिकों के पक्ष में अहम फैसला सुनाते हुए निगम की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा है कि किसी पद को भविष्य में समाप्त होने वाला कैडर घोषित कर देने मात्र से कर्मचारियों को नियमितीकरण के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

29 साल पुराना है विवाद

यह मामला लगभग 29 वर्ष पुराना है। केंद्र सरकार के श्रम मंत्रालय ने वर्ष 1997 में एक संदर्भ केंद्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण सह श्रम न्यायालय जबलपुर को भेजा था। इसमें बिलासपुर स्थित एफसीआई गोदामों में कार्यरत अनिल कुमार धोपते और अन्य 19 श्रमिकों के नियमितीकरण के प्रश्न पर निर्णय लिया जाना था।

वर्षों तक करते रहे काम

श्रमिकों का कहना था कि उन्होंने पहले ठेकेदार के माध्यम से और बाद में विभिन्न व्यवस्थाओं के तहत लगातार एफसीआई के गोदामों में काम किया। उनका दावा था कि वे लंबे समय से नियमित प्रकृति के कार्यों का निर्वहन कर रहे थे, इसलिए उन्हें नियमित कर्मचारी का दर्जा मिलना चाहिए।

श्रम न्यायालय ने दिया था श्रमिकों के पक्ष में फैसला

वर्ष 2014 में केंद्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण ने श्रमिकों के पक्ष में निर्णय देते हुए प्रबंधन को नियमितीकरण पर विचार करने का निर्देश दिया था। इसके बाद एफसीआई प्रबंधन ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

क्या थी प्रबंधन की दलील

एफसीआई का तर्क था कि संबंधित कर्मचारी केवल कैजुअल श्रमिक थे और जिस कैडर में वे कार्यरत थे उसे डाइंग कैडर घोषित किया जा चुका है। इसलिए नियमितीकरण संभव नहीं है।

दूसरी ओर श्रमिकों ने विभिन्न न्यायिक निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि लंबे समय तक स्थायी प्रकृति का कार्य करने वाले कैजुअल कर्मचारियों के मामले में नियमितीकरण पर विचार किया जा सकता है।

अदालत ने क्या कहा

न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने कहा कि श्रमिकों द्वारा किया जा रहा कार्य स्थायी प्रकृति का था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि डाइंग कैडर संबंधी नियमों को पूर्व प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता।

नियमितीकरण का रास्ता साफ

हाई कोर्ट ने श्रम न्यायालय के आदेश को सही मानते हुए एफसीआई की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने माना कि श्रमिकों की नियमितीकरण की मांग न्यायसंगत और कानूनी रूप से स्वीकार्य है। इस फैसले के बाद वर्षों से लंबित मामले में श्रमिकों के लिए राहत का रास्ता खुल गया है

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