सीजी भास्कर, 09 जून। देश में बदलते सामाजिक परिवेश और रिश्तों को लेकर एक बार फिर अहम कानूनी चर्चा शुरू (Supreme Court Adult Consent ) हो गई है। सर्वोच्च अदालत की हालिया टिप्पणी ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता, आपसी सहमति और सामाजिक सोच से जुड़े कई मुद्दों को केंद्र में ला दिया है। फैसले के बाद कानूनी विशेषज्ञों और आम लोगों के बीच भी इसकी व्यापक चर्चा हो रही है।
अदालत ने अपने अवलोकन में यह स्पष्ट संकेत दिया कि आधुनिक समाज में रिश्तों को केवल पारंपरिक नजरिए से नहीं देखा जा सकता। न्यायालय ने कहा कि किसी संबंध का अंत हो जाना अपने आप में अपराध या धोखाधड़ी साबित नहीं करता और हर मामले को उसके तथ्यों के आधार पर परखा जाना चाहिए।
सहमति से बने संबंधों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी : Supreme Court Adult Consent
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि दो बालिग व्यक्तियों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को किसी व्यक्ति के चरित्र का पैमाना नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि देश में ऐसा कोई कानून नहीं है जो दो बालिगों को अपनी इच्छा से संबंध बनाने से रोकता हो।
पुलिस भर्ती से जुड़ा था मामला
यह मामला तेलंगाना के एक पुलिस कांस्टेबल अभ्यर्थी की भर्ती से संबंधित था। उम्मीदवार का चयन एक पुराने आपराधिक मामले के आधार पर प्रभावित हुआ था। मामला एक महिला के साथ रिश्ते से जुड़ा था, जिसे बाद में आपसी समझौते के जरिए समाप्त कर दिया गया था।
हर रिश्ता शादी तक पहुंचे यह जरूरी नहीं
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि सभी रिश्ते विवाह तक नहीं पहुंचते। केवल इस आधार पर कि कोई संबंध शादी में नहीं बदला, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसी पक्ष ने दूसरे के साथ धोखा किया है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में परिस्थितियों और तथ्यों को ध्यान में रखना जरूरी है।
बदल रही हैं सामाजिक वास्तविकताएं
न्यायालय ने कहा कि समाज की वास्तविकताएं समय के साथ बदल (Supreme Court Adult Consent) रही हैं और सरकारी संस्थानों तथा विभागों को भी पुरानी सोच से बाहर निकलकर वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों को समझना होगा। अदालत ने माना कि लंबे समय तक बने रिश्तों को सामान्य रूप से आपसी सहमति पर आधारित माना जाना चाहिए।
चरित्र पर टिप्पणी का अधिकार नहीं
अदालत ने यह भी कहा कि किसी उम्मीदवार के चरित्र पर केवल अनुमान के आधार पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। यदि शिकायतकर्ता स्वयं मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहती और समझौते के बाद विवाद समाप्त हो चुका है, तो विभाग अपने स्तर पर निष्कर्ष निकालकर व्यक्ति को दोषी नहीं ठहरा सकता।
उम्मीदवार को मिली राहत
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अभ्यर्थी को राहत देते हुए कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उसके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकालना उचित (Supreme Court Adult Consent) नहीं था। अदालत ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत संबंधों से जुड़े मामलों में बिना पर्याप्त साक्ष्य किसी व्यक्ति की छवि या पात्रता पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता।



