सीजी भास्कर, 14 अक्टूबर : देश में महंगाई (थोक महंगाई दर में बढ़ोतरी (Wholesale Inflation September 2026)) ने एक बार फिर रफ्तार पकड़ ली है। सितंबर में थोक महंगाई दर बढ़कर 11.39% पर पहुंच गई, जबकि अगस्त में यह 9.92% थी। पांच महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंची महंगाई का असर खाने-पीने की वस्तुओं, ईंधन, बिजली और कारखानों में बनने वाले सामान की कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में सामने आया है। सरकार की ओर से 14 अक्टूबर को जारी आंकड़ों के मुताबिक, खुदरा महंगाई दर भी अगस्त के 4.82% से बढ़कर सितंबर में 5.54% हो गई। यानी महंगाई का दबाव थोक बाजार के साथ आम उपभोक्ताओं तक भी पहुंच रहा है।
11.39% पर पहुंची महंगाई
सितंबर में थोक महंगाई दर में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। अगस्त में यह 9.92% थी, जो सितंबर में बढ़कर 11.39% हो गई। थोक बाजार में कीमतों में इस बढ़ोतरी (थोक महंगाई के ताजा आंकड़े (Wholesale Inflation September 2026)) से पिछले साल के मुकाबले सामान महंगा हुआ है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी वस्तु की कीमत पिछले साल थोक बाजार में 100 रुपये थी और उसकी कीमत में 11.39% की सालाना बढ़ोतरी हुई है, तो अब वह लगभग 111.39 रुपये की होगी। यह उदाहरण महंगाई दर का अर्थ समझाने के लिए है; हर वस्तु की कीमत में समान बढ़ोतरी जरूरी नहीं है।
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खाने-पीने की चीजें महंगी
खाद्य पदार्थों की महंगाई दर अगस्त के 7.05% से बढ़कर सितंबर में 8.66% हो गई। वहीं, प्राइमरी आर्टिकल्स यानी कच्चे माल की महंगाई दर 7.76% से बढ़कर 8.67% दर्ज की गई। खाने-पीने की वस्तुओं और कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी से कारोबारियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो कुछ उत्पादों की खुदरा कीमतों पर भी इसका असर पड़ सकता है।
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ईंधन और बिजली में उछाल
ईंधन और बिजली क्षेत्र में महंगाई दर अगस्त के 22.93% से बढ़कर सितंबर में 25.85% पर पहुंच गई। इसी तरह, मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स यानी कारखानों में निर्मित वस्तुओं की महंगाई दर 8.37% से बढ़कर 9.76% हो गई। पेट्रोल-डीजल, कच्चे तेल, गैस, कोयले और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में कीमतों की तेजी उत्पादन और परिवहन लागत को प्रभावित कर सकती है। इन क्षेत्रों में बढ़ोतरी (ईंधन और निर्मित वस्तुओं की महंगाई (Wholesale Inflation September 2026)) के दबाव को समझने का अहम संकेत है।
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खुदरा महंगाई भी बढ़ी
सितंबर में खुदरा महंगाई दर 5.54% दर्ज की गई, जबकि अगस्त में यह 4.82% थी। खुदरा महंगाई को कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) के जरिए मापा जाता है। यह उन कीमतों में बदलाव बताती है, जिनका भुगतान आम उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं के लिए करते हैं। इसके विपरीत, थोक मूल्य सूचकांक (WPI) थोक स्तर पर वस्तुओं की कीमतों में बदलाव को दर्शाता है। दोनों सूचकांकों में अंतर होने के कारण थोक महंगाई में बढ़ोतरी का असर खुदरा बाजार में तुरंत या उसी अनुपात में दिखना जरूरी नहीं है।
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नए बेस ईयर से गणना
सरकार ने 15 जून 2026 को थोक मूल्य सूचकांक के लिए नया बेस ईयर 2022-23 लागू किया था। इससे पहले WPI की गणना के लिए 2011-12 को आधार वर्ष माना जाता था। बेस ईयर वह साल होता है, जिसे कीमतों में बदलाव की तुलना करने के लिए आधार बनाया जाता है। नई आधार श्रृंखला के तहत जारी आंकड़ों (थोक मूल्य सूचकांक की नई गणना (Wholesale Inflation September 2026)) को समझते समय पुराने आधार वर्ष और नई श्रृंखला के बीच के अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है।
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आम आदमी पर क्या असर
थोक महंगाई बढ़ने से कंपनियों और कारोबारियों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है। यदि लागत में बढ़ोतरी लंबे समय तक बनी रहती है, तो कुछ कंपनियां इसका हिस्सा ग्राहकों पर डाल सकती हैं। हालांकि, अंतिम कीमतों पर असर मांग, प्रतिस्पर्धा, करों और अन्य लागतों पर भी निर्भर करता है। खाद्य पदार्थों, ईंधन और निर्मित वस्तुओं की कीमतों में लगातार तेजी बनी रहने पर घरेलू बजट पर दबाव बढ़ सकता है। आने वाले महीनों में महंगाई की दिशा समझने के लिए थोक और खुदरा, दोनों महंगाई दरों के अगले आंकड़ों पर नजर रहेगी।
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