सीजी भास्कर, 17 अक्टूबर : देशभर में दशहरा रावण दहन और बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, लेकिन बस्तर का दशहरा इससे बिल्कुल अलग है। यहां न रावण का पुतला जलाया जाता है और न ही राम-रावण युद्ध इस पर्व का केंद्र है। बस्तर में मां दंतेश्वरी की आराधना, आदिवासी संस्कृति और पारंपरिक रथ परिक्रमा के साथ मनाए जाने वाले इस उत्सव (Bastar Dussehra History) की परंपरा करीब 600 साल पुरानी मानी जाती है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह पर्व क्षेत्र की आस्था और सांस्कृतिक विरासत की अनूठी पहचान है।
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राजा पुरुषोत्तम देव से जुड़ा इतिहास
बस्तर दशहरे का इतिहास काकतीय राजवंश के राजा पुरुषोत्तम देव से जोड़ा जाता है। प्रचलित ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, जगन्नाथ पुरी की यात्रा और भगवान जगन्नाथ के प्रति उनकी भक्ति के बाद बस्तर में रथोत्सव की परंपरा को विशेष महत्व मिला। ऐतिहासिक विवरणों में राजा को ‘रथपति’ की उपाधि मिलने का उल्लेख भी मिलता है। इसी परंपरा ने आगे चलकर बस्तर दशहरे को विशिष्ट पहचान दी। इस पर्व (Bastar Dussehra History) में धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय इतिहास की झलक भी दिखाई देती है।
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75 दिनों तक उत्सव
बस्तर दशहरा केवल एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि कई धार्मिक अनुष्ठानों और सामुदायिक परंपराओं से जुड़ा लंबा उत्सव है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में स्थानीय देवी-देवताओं के आगमन, पूजा-अर्चना, पारंपरिक रस्मों और रथ परिक्रमा का विशेष महत्व है। देश के कई हिस्सों में दशहरा रावण दहन के साथ संपन्न हो जाता है, जबकि बस्तर में अलग-अलग चरणों में उत्सव आगे बढ़ता है।
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रामायण से अलग परंपरा
बस्तर दशहरे की सबसे खास बात यह है कि इसका मुख्य आधार रावण वध की परंपरा नहीं है। यहां मां दंतेश्वरी और क्षेत्रीय देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा पर्व के केंद्र में रहती है। इसलिए यहां रावण दहन नहीं किया जाता। इसके बजाय धार्मिक अनुष्ठान, देवी-देवताओं के प्रतीकों और पालकियों का आगमन तथा पारंपरिक रथ यात्रा जैसे आयोजन होते हैं। यही अंतर बस्तर के दशहरे (Bastar Dussehra History) को देश के दूसरे हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरे से अलग बनाता है।
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हरेली अमावस्या से शुरुआत
इतिहासकार अप्रतिम झा के अनुसार, बस्तर दशहरे की शुरुआत हरेली अमावस्या पर होने वाली पाट जात्रा से होती है। इस अनुष्ठान में जंगल से लाई गई साल वृक्ष की लकड़ी के लट्ठे की पूजा की जाती है। इसके बाद काछनगादी, जोगी बिठाई, मावली परघाव, रथ परिक्रमा और मुरिया दरबार जैसे आयोजन होते हैं। इन रस्मों में प्रकृति, स्थानीय देवी-देवताओं, आदिवासी मान्यताओं और सामुदायिक सहभागिता का गहरा संबंध दिखाई देता है।
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रथ परिक्रमा का महत्व
बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी का यहां के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में विशेष स्थान है। पर्व के दौरान विशाल पारंपरिक रथ को खींचने में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और श्रद्धालु भाग लेते हैं। विभिन्न गांवों से देवी-देवताओं के प्रतीकों और पारंपरिक प्रतिनिधियों का जुड़ना इस आयोजन को व्यापक सामुदायिक स्वरूप देता है। रथ परिक्रमा (Bastar Dussehra History) केवल धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि सामूहिक आस्था और सांस्कृतिक एकजुटता का प्रतीक भी है।
बस्तर दशहरा इस बात का उदाहरण है कि एक ही पर्व अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय इतिहास, आस्था और परंपराओं के अनुसार अलग रूप ले सकता है। मां दंतेश्वरी की आराधना और आदिवासी परंपराओं से जुड़ा यह उत्सव आज भी बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए हुए है।
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