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Tirumala Temple : तिरुमाला मंदिर के गर्भगृह में क्यों नहीं बजती घंटी? जानिए आस्था, परंपरा और शास्त्रों से जुड़ा रहस्य

By Newsdesk Admin
19/07/2026
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Tirumala Temple
Tirumala Temple

सीजी भास्कर, 18 जुलाई : आंध्र प्रदेश के प्रसिद्ध भगवान श्री वेंकटेश्वर स्वामी (बालाजी) मंदिर में कई ऐसी परंपराएं हैं, जो सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई हैं। इन्हीं में से एक है गर्भगृह में छोटी घंटी का नहीं होना। जहां अधिकांश हिंदू मंदिरों में पूजा-अर्चना के दौरान घंटी बजाना शुभ माना जाता है, वहीं तिरुमाला मंदिर (Tirumala Temple) के मुख्य गर्भगृह में यह परंपरा नहीं निभाई जाती। इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं, वैखानस आगम शास्त्र और ऐतिहासिक परंपराओं का विशेष महत्व बताया जाता है।

Contents
  • Tirumala Temple : संत वेदांत देशिका की कथा से जुड़ी मान्यता
  • वैखानस आगम शास्त्र में भी मिलता है उल्लेख
  • बाहर मौजूद है ऐतिहासिक घंटा मंडपम
  • विजयनगर काल से जुड़ी है ऐतिहासिक परंपरा
  • आस्था और इतिहास के बीच संतुलन

वेंकटेश्वर मंदिर, तिरुमाला - विकिपीडिया

आंध्र प्रदेश के तिरुपति स्थित विश्वप्रसिद्ध तिरुमाला मंदिर में प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु भगवान श्री वेंकटेश्वर स्वामी के दर्शन करने पहुंचते हैं। मंदिर की हर परंपरा का अपना अलग महत्व है और इन्हीं में गर्भगृह में घंटी न बजाने की परंपरा भी शामिल है। वर्षों से यह विषय श्रद्धालुओं और धर्म के जानकारों के बीच जिज्ञासा का कारण बना हुआ है।

Tirumala Temple : संत वेदांत देशिका की कथा से जुड़ी मान्यता

लोकमान्यताओं के अनुसार, यह परंपरा महान वैष्णव संत श्री वेदांत देशिका के जन्म से जुड़ी हुई है। धार्मिक कथा के अनुसार, एक दंपति लंबे समय तक संतान प्राप्ति के लिए भगवान वेंकटेश्वर की आराधना कर रहा था। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने स्वप्न में दर्शन दिए और अपने हाथ की दिव्य घंटी उन्हें प्रसाद स्वरूप प्रदान की।

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मान्यता है कि इसके बाद उसी दंपति के घर संत वेदांत देशिका का जन्म हुआ। वैष्णव परंपरा में उन्हें भगवान की दिव्य घंटी का अवतार माना जाता है। कहा जाता है कि इस घटना के बाद भगवान के गर्भगृह में दोबारा छोटी घंटी स्थापित नहीं की गई और यह परंपरा आज तक चली आ रही है। हालांकि इस कथा को धार्मिक आस्था का विषय माना जाता है।

वैखानस आगम शास्त्र में भी मिलता है उल्लेख

धार्मिक विद्वानों के अनुसार, इस परंपरा का आधार केवल लोककथा नहीं बल्कि वैखानस आगम (Vaikhanasa Agama) की पूजा-पद्धति भी है। तिरुमाला मंदिर में पूजा-अर्चना प्राचीन वैखानस आगम शास्त्र के अनुसार होती है। इस परंपरा में गर्भगृह की व्यवस्था, पूजन विधि और धार्मिक अनुष्ठानों के स्पष्ट नियम निर्धारित किए गए हैं। मंदिर प्रशासन भी इसी आगमिक परंपरा का पालन करता है। इसलिए गर्भगृह के भीतर घंटी न रखना किसी भूल या कमी का परिणाम नहीं, बल्कि सदियों पुरानी धार्मिक व्यवस्था का हिस्सा माना जाता है।

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बाहर मौजूद है ऐतिहासिक घंटा मंडपम

हालांकि मुख्य गर्भगृह में छोटी घंटी नहीं है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मंदिर में घंटियां नहीं बजतीं। मंदिर परिसर के बाहर स्थित ऐतिहासिक घंटा मंडपम (Ghanta Mandapam), जिसे महामणि मंडपम भी कहा जाता है, वहां विशाल घंटियां स्थापित हैं।

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भगवान को नैवेद्य अर्पित किए जाने के समय इन्हीं घंटियों का नाद किया जाता है। इनकी ध्वनि पूरे मंदिर परिसर में गूंजती है और इसे पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

विजयनगर काल से जुड़ी है ऐतिहासिक परंपरा

इतिहासकारों के अनुसार, विजयनगर साम्राज्य के समय इन घंटियों का विशेष महत्व था। कहा जाता है कि मंदिर की घंटियों की ध्वनि चंद्रगिरि किले तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई थी। जैसे ही भगवान को नैवेद्य अर्पित किया जाता और घंटियां बजतीं, उसी संकेत पर राजा अपना भोजन ग्रहण करते थे। यह परंपरा मंदिर और तत्कालीन शासन व्यवस्था के बीच धार्मिक समन्वय का प्रतीक मानी जाती है।

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आस्था और इतिहास के बीच संतुलन

धार्मिक और ऐतिहासिक विशेषज्ञों का कहना है कि संत वेदांत देशिका और भगवान की दिव्य घंटी से जुड़ी कथा लोकश्रुतियों और श्रद्धालुओं की आस्था का हिस्सा है। इस कथा की पुष्टि करने वाला कोई प्रमाणित ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे ऐतिहासिक तथ्य के बजाय धार्मिक परंपरा और विश्वास के रूप में देखा जाता है।

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इसके विपरीत, वैखानस आगम शास्त्र के अनुसार गर्भगृह की व्यवस्था और पूजा-पद्धति का पालन आज भी विधिवत किया जाता है। यही कारण है कि तिरुमाला मंदिर की यह अनूठी परंपरा सदियों बाद भी अक्षुण्ण बनी हुई है और श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण तथा जिज्ञासा का विषय बनी रहती है।

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