सीजी भास्कर, 10 सितंबर : छत्तीसगढ़ में भूजल स्थिति में ऐतिहासिक सुधार दर्ज हुआ है। प्रदेश में भूजल की स्थिति (Chhattisgarh Groundwater) का आकलन करने पर अब एक भी विकासखंड क्रिटिकल श्रेणी में नहीं मिला है। वर्ष 2020 में जहां 9 विकासखंड इस श्रेणी में थे, वहीं 2025 में भी 5 विकासखंड क्रिटिकल थे। वर्ष 2026 के आकलन में ये सभी विकासखंड इस श्रेणी से बाहर आ गए हैं।

क्रिटिकल विकासखंड हुए शून्य Chhattisgarh Groundwater
भूजल संसाधन आकलन-2026 के अनुसार प्रदेश के 12 विकासखंडों की भूजल श्रेणी में सुधार हुआ है, जबकि किसी भी विकासखंड की स्थिति खराब नहीं हुई। विकासखंडवार भूजल आकलन शुरू होने के बाद इसे छत्तीसगढ़ का अब तक का सबसे बड़ा एक-चक्रीय सुधार बताया गया है।
प्रदेश में सुरक्षित श्रेणी वाले विकासखंडों की संख्या बढ़कर 127 हो गई है। भूजल स्थिति में सुधार (Chhattisgarh Groundwater) का यह आंकड़ा जल संरक्षण और भूजल प्रबंधन के लिए किए जा रहे प्रयासों के असर को दर्शाता है।
14.65 BCM हुआ भूजल रिचार्ज
भूजल संसाधन आकलन-2026 के मुताबिक प्रदेश में वार्षिक भूजल रिचार्ज बढ़कर 14.65 बिलियन घन मीटर (BCM) हो गया है। यह अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। वर्ष 2017 में प्रदेश का वार्षिक भूजल रिचार्ज 11.57 BCM दर्ज किया गया था।
जल संरक्षण संरचनाओं के निर्माण और पुराने जलस्रोतों के पुनर्जीवन से रिचार्ज में बड़ा सुधार हुआ है। वर्ष 2020 की तुलना में तालाबों और पोखरों से होने वाले भूजल रिचार्ज में 266.9 प्रतिशत, जबकि अन्य जल संरक्षण संरचनाओं से होने वाले रिचार्ज में 202.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
वर्ष 2026 के आकलन के लिए प्रदेशभर में कुल 2 लाख 28 हजार 736 जल संरचनाएं दर्ज की गई हैं। जल संचय जनभागीदारी और जल शक्ति अभियान-कैच द रेन के तहत बनाई और पुनर्जीवित की गई संरचनाओं ने भूजल पुनर्भरण बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
पहली बार दोहन में भी कमी
इस आकलन की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि भूजल दोहन में आई कमी है। वर्ष 2026 में प्रदेश का कुल भूजल दोहन 6.21 BCM दर्ज किया गया, जबकि पिछले आकलन चक्र में यह 6.30 BCM था। उपलब्ध आकलन रिकॉर्ड में यह पहली वार्षिक गिरावट है।
भूजल दोहन का स्तर वर्ष 2022 में 49.5 प्रतिशत तक पहुंच गया था, जो अब घटकर 46.37 प्रतिशत रह गया है। यह 70 प्रतिशत की सुरक्षित सीमा से काफी नीचे है। भूजल संरक्षण (Chhattisgarh Groundwater) में यह बदलाव केवल बेहतर रिचार्ज का परिणाम नहीं माना जा रहा, बल्कि जल मांग के प्रबंधन और किसानों द्वारा फसल पद्धति में बदलाव का भी असर बताया गया है।
बेमेतरा-राजनांदगांव में बड़ा बदलाव
भूजल दोहन घटने में फसल विविधीकरण की भी अहम भूमिका सामने आई है। गर्मी के मौसम में धान का रकबा कम होने से सिंचाई के लिए भूजल पर दबाव घटा है। बेमेतरा और राजनांदगांव में किसानों की सहभागिता से इसका स्पष्ट असर देखने को मिला है।
बेमेतरा में गर्मी के धान का रकबा करीब 26 हजार हेक्टेयर से घटकर 5 हजार हेक्टेयर रह गया है। वहीं राजनांदगांव में यह रकबा 9,400 हेक्टेयर से घटकर करीब 2,800 हेक्टेयर हो गया। दोनों जिलों में मिलाकर गर्मी के धान के रकबे में लगभग 27,600 हेक्टेयर की कमी आई है।
बेमेतरा लगातार चार आकलन चक्रों के बाद क्रिटिकल श्रेणी से बाहर आया है। जिले में वर्ष 2023 की तुलना में कुल भूजल दोहन में करीब 20 प्रतिशत कमी दर्ज की गई है। राजनांदगांव में भी वर्ष 2022 के 70.5 प्रतिशत दोहन स्तर के मुकाबले अब स्थिति सुरक्षित श्रेणी में पहुंच गई है।
19 विकासखंड अभी अर्ध-संकटग्रस्त
प्रदेश में क्रिटिकल विकासखंडों की संख्या भले ही शून्य हो गई है, लेकिन भूजल प्रबंधन की चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। वर्तमान में 11 जिलों के 19 विकासखंड अर्ध-संकटग्रस्त श्रेणी में हैं।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने वर्ष 2030 तक प्रदेश के किसी भी विकासखंड को भूजल तनावग्रस्त नहीं रहने देने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए अर्ध-संकटग्रस्त विकासखंडों में जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, फसल विविधीकरण और जनभागीदारी पर विशेष जोर दिया जाएगा।
वर्ष 2026-27 में बेमेतरा, बिलासपुर और जांजगीर-चांपा के करीब 5,442 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में NAQUIM 2.0 के तहत जलभृत मानचित्रण अध्ययन प्रस्तावित है। इससे भूजल उपलब्धता और जलभृतों की स्थिति का अधिक वैज्ञानिक आकलन किया जा सकेगा।
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किसानों को दिया उपलब्धि का श्रेय
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इस उपलब्धि का श्रेय प्रदेश के किसानों, नागरिकों और मैदानी अमले को दिया। उन्होंने कहा कि यह केवल सरकारी योजनाओं का परिणाम नहीं, बल्कि जनभागीदारी और सामूहिक प्रयास का नतीजा है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह उपलब्धि महानदी भवन में नहीं, बल्कि खेतों और गांवों में हासिल हुई है। बेमेतरा और राजनांदगांव सहित प्रदेश के किसानों ने आने वाली पीढ़ियों की जल सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए खेती के तौर-तरीकों में बदलाव स्वीकार किया।
उनके मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘जन शक्ति से जल शक्ति’ के आह्वान और ‘जल संचय जन भागीदारी’ अभियान से जल संरक्षण के प्रयासों को व्यापक आधार मिला। अलग-अलग विभागों, जिला प्रशासन, किसानों और नागरिकों के समन्वित प्रयास से भूजल संरक्षण (Chhattisgarh Groundwater) को जनआंदोलन का स्वरूप मिला है।
2030 तक सुरक्षित बनाने का लक्ष्य
राज्य सरकार अब इस उपलब्धि को अगले चरण तक ले जाने की तैयारी कर रही है। वर्ष 2026-27 में ‘कैच द रेन’ योजना को विकासखंड स्तर के मासिक लक्ष्यों के साथ लागू करने की तैयारी है, ताकि क्षेत्र की भूजल स्थिति के अनुसार संरक्षण और पुनर्भरण के काम किए जा सकें।
जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, पानी का विवेकपूर्ण उपयोग और कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देने जैसे उपायों पर आगे भी जोर रहेगा। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक प्रदेश के सभी विकासखंडों को भूजल की दृष्टि से सुरक्षित बनाना है।



