सीजी भास्कर, 06 अगस्त। सरकारी नौकरी से जुड़े एक अहम मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ऐसा फैसला (Compassionate Appointment) सुनाया है, जिसका असर कई परिवारों पर पड़ सकता है। अदालत ने साफ कर दिया कि केवल शादीशुदा होने के आधार पर किसी बहन को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। फैसले के बाद इस मुद्दे को लेकर कानूनी और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
अदालत ने माना कि अनुकंपा नियुक्ति का मूल उद्देश्य मृतक शासकीय कर्मचारी के परिवार को आर्थिक संकट से उबारना है। ऐसे में किसी महिला की वैवाहिक स्थिति को आधार बनाकर उसके अधिकार को नकारना उचित नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने राज्य सरकार के पुराने आदेश को रद्द करते हुए मामले में दोबारा निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं।

यह भी पढ़ें : Smart Meter : स्मार्ट मीटर और बिजली बिल को लेकर कांग्रेस का बड़ा ऐलान, मांगें नहीं मानी गईं तो होगा चरणबद्ध आंदोलन
राज्य सरकार का आदेश किया निरस्त Compassionate Appointment
जस्टिस संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने राज्य सरकार के 19 सितंबर 2019 के आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने संबंधित विभाग को निर्देश दिया कि मृतक कर्मचारी की विवाहित बहन के अनुकंपा नियुक्ति आवेदन पर नियमों के अनुरूप चार सप्ताह के भीतर पुनर्विचार कर नया आदेश जारी किया जाए।
क्या है पूरा मामला
मामला बिलासपुर के नेहरू नगर निवासी दुर्गेश मिश्रा से जुड़ा है, जो जांजगीर चांपा में जिला लोक अभियोजन अधिकारी के पद पर कार्यरत थे। 13 जून 2018 को सेवा के दौरान उनका निधन हो गया। दुर्गेश अविवाहित थे। इसके बाद उनकी मां तारा मिश्रा ने वर्ष 2013 की अनुकंपा नियुक्ति नीति के तहत अपनी बेटी अमिता दुबे को नौकरी दिए जाने के लिए आवेदन किया था।
यह भी पढ़ें : BJP Meeting : संगठन को धार देने की तैयारी तेज, बैठक में बूथ से लेकर तिरंगा यात्रा तक बना बड़ा खाका
विवाहित होने का हवाला देकर किया था आवेदन खारिज
गृह एवं सामान्य प्रशासन विभाग ने 19 सितंबर 2019 को यह कहते हुए आवेदन अस्वीकार कर दिया था कि अनुकंपा नियुक्ति नीति में विवाहित बहन को नौकरी देने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। इसके बाद इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
आर्थिक निर्भरता को बताया सबसे अहम आधार Compassionate Appointment
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि केवल विवाह के आधार पर किसी महिला को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15(1) का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने भी अपने फैसले में कहा कि ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण आधार परिवार की आर्थिक निर्भरता और वास्तविक आवश्यकता है, न कि किसी व्यक्ति का वैवाहिक दर्जा।
यह भी पढ़ें : Peepal For People Campaign : 15 एकड़ में लगाएंगे 2500 से ज्यादा पीपल के पौधे, मुख्यमंत्री ने शुरू किया अभियान
पुरानी सोच बदलने की जरूरत
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि वर्तमान समय में कई शादीशुदा बेटियां और बहनें अपने माता पिता और मायके की आर्थिक जिम्मेदारियां (Compassionate Appointment) निभाती हैं। इसलिए यह मान लेना कि विवाह के बाद उनका मायके से संबंध पूरी तरह समाप्त हो जाता है, एक पुरानी और रूढ़िवादी सोच है, जिसे संवैधानिक समानता के सिद्धांत के अनुरूप स्वीकार नहीं किया जा सकता।
खबरें और भी हैं : Wild Mushroom : देशी मशरूम के स्वाद पर फिदा लोग, लेकिन इसे जुटाने में हर कदम पर मौत का खतरा


