सीजी भास्कर, 04 अगस्त। सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की अदालतों के लिए नई न्यायिक भाषा संबंधी गाइडलाइन जारी करते हुए कहा है कि रेप और यौन उत्पीड़न से जुड़े मामलों की सुनवाई और फैसलों में ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जाए जो पीड़ित-केंद्रित और लैंगिक रूप से संवेदनशील हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि फैसलों में ऐसे शब्दों और अभिव्यक्तियों से बचना चाहिए जो पीड़ित को दोषी ठहराने, उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाने या रूढ़िवादी सोच को बढ़ावा देने वाली हों। (Supreme Court Guidelines)

फैसलों में सम्मानजनक और तटस्थ भाषा पर जोर : Supreme Court Guidelines
विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के आधार पर जारी दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि “इज्जत”, “पवित्रता”, “मर्यादा भंग”, “बेबस महिला” और “पवित्रता खो दी” जैसे शब्दों के प्रयोग से बचा जाए। इसके स्थान पर “पीड़ित”, “सर्वाइवर”, “शिकायतकर्ता”, “यौन उत्पीड़न” और “शारीरिक स्वायत्तता” जैसे कानूनी और तटस्थ शब्दों के इस्तेमाल की सलाह दी गई है। गाइडलाइन में कहा गया है कि न्यायिक भाषा का उद्देश्य अपराध और उसके प्रभाव पर केंद्रित होना चाहिए, न कि नैतिक निर्णय देना।
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रूढ़िवादी धारणाओं से बचने की सलाह
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि रिपोर्ट दर्ज कराने में देरी, शरीर पर चोट के निशान न होना या पीड़ित द्वारा प्रतिरोध न कर पाना किसी भी स्थिति में सहमति का प्रमाण नहीं माना जा सकता। अदालत ने जजों को निर्देश दिया कि सुनवाई के दौरान पीड़ित के कपड़ों, निजी जीवन, चरित्र या यौन इतिहास से जुड़े अनावश्यक और अपमानजनक सवालों को रोका जाए। गाइडलाइन में इस बात पर भी जोर दिया गया कि प्रत्येक पीड़ित के साथ अदालत में सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित किया जाए और न्यायिक प्रक्रिया पूरी तरह संवेदनशील एवं संविधान के मूल्यों के अनुरूप हो।
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