सीजी भास्कर, 11 अगस्त : छत्तीसगढ़ के नगरीय निकायों में अब महिला जनप्रतिनिधियों (Councillor Husband Ban) की जगह उनके पति या अन्य रिश्तेदार सरकारी कामकाज नहीं संभाल सकेंगे। राज्य सरकार ने महिला पार्षदों और अन्य निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के काम में परिजनों की दखल पर रोक लगा दी है। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने नियमों में बदलाव की अधिसूचना राजपत्र में जारी कर दी है। नए नियम के तहत महिला जनप्रतिनिधि अपने पति, बेटे, बेटी, भाई, बहन या किसी अन्य करीबी रिश्तेदार को प्रतिनिधि या समन्वयक नियुक्त नहीं कर सकेंगी।
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शिकायतों के बाद सरकार ने बदले नियम
सरकार के मुताबिक महिला जनप्रतिनिधियों (Councillor Husband Ban) को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से यह फैसला लिया गया है। विभाग को लगातार ऐसी शिकायतें मिल रही थीं कि निर्वाचित महिला पार्षदों की जगह उनके पति या परिवार के अन्य सदस्य कार्यालयों में जाकर सरकारी कामकाज में दखल देते हैं।
उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने भी ऐसी शिकायतें मिलने की जानकारी दी थी। इसके बाद सरकार ने नियमों में बदलाव कर यह व्यवस्था स्पष्ट कर दी कि जनता द्वारा चुनी गई महिला प्रतिनिधि को अपनी जिम्मेदारी खुद निभानी होगी।
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अब खुद संभालना होगा पूरा काम
नए नियम लागू होने के बाद महिला पार्षदों को अपने क्षेत्र से जुड़े विकास कार्य, जनसुनवाई, अधिकारियों के साथ बैठक और अन्य प्रशासनिक मामलों में खुद सक्रिय रहना होगा। उनके स्थान पर पति या रिश्तेदार प्रतिनिधि के तौर पर काम नहीं कर सकेंगे।
सरकार का मानना है कि इससे महिला जनप्रतिनिधियों (Councillor Husband Ban) की निर्णय लेने की क्षमता बढ़ेगी और वे अपने अधिकारों एवं जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से निभा सकेंगी। साथ ही जनता और निर्वाचित प्रतिनिधि के बीच सीधा संवाद भी मजबूत होगा।
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महिला राजनीतिक सशक्तिकरण पर जोर
सरकार के इस फैसले को नगरीय निकायों में महिला राजनीतिक भागीदारी को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। महिला आरक्षण के जरिए चुनाव जीतने वाली प्रतिनिधियों को अब अपने पद की जिम्मेदारी खुद निभानी होगी। नियम का प्रभावी क्रियान्वयन होने पर नगरीय निकायों में महिलाओं की भूमिका केवल नाममात्र की न रहकर निर्णय और प्रशासनिक कामकाज में भी मजबूत होने की उम्मीद है।
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170 से ज्यादा नगरीय निकायों में पड़ेगा असर
छत्तीसगढ़ में 170 से ज्यादा नगरीय निकाय हैं, जहां करीब 9,500 पार्षद चुने जाते हैं। इनमें महिला आरक्षण के तहत बड़ी संख्या में महिलाएं निर्वाचित हुई हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में महिला पार्षदों की संख्या 3 हजार से अधिक है। नए नियम का सीधा असर इन महिला जनप्रतिनिधियों पर पड़ेगा। अब उनके स्थान पर पति या अन्य रिश्तेदार सरकारी कामकाज में प्रतिनिधि की भूमिका नहीं निभा सकेंगे।
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