सीजी भास्कर, 8 सितंबर : धमतरी के वनांचल क्षेत्र में बारिश (Farm Pond Dhamtari) का पानी अब सिर्फ बहकर बर्बाद नहीं हो रहा, बल्कि ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने का जरिया बन रहा है। कुकरेल क्षेत्र में 200 से अधिक फार्म पॉन्ड यानी डबरियां तैयार की गई हैं। इन जल संरचनाओं ने सिंचाई के साथ मछली और झींगा पालन का रास्ता खोल दिया है, जिससे ग्रामीणों को अतिरिक्त आमदनी का अवसर मिल रहा है।
यह बदलाव धमतरी जिले के नगरी विकासखंड के कुकरेल क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। वीबी-जी रामजी योजना के तहत तैयार की गई इन डबरियों को जल संरक्षण के साथ आजीविका से जोड़ा गया है। खेती के लिए पानी मिलने के साथ अब डबरियों में मछली पालन भी किया जा रहा है, जिससे यह मॉडल (Farm Pond Dhamtari) ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का माध्यम बन रहा है।
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बारिश का पानी अब खेतों के काम आएगा
कुकरेल क्लस्टर में योजनाबद्ध तरीके से 200 से अधिक फार्म पॉन्ड बनाए गए हैं। प्रत्येक डबरी का मानक आकार 20 मीटर लंबा, 20 मीटर चौड़ा और 3 मीटर गहरा रखा गया है। इन जल संरचनाओं में बारिश का पानी जमा हो रहा है, जिससे किसानों को सिंचाई के लिए अतिरिक्त जल स्रोत मिल गया है।
पहले बारिश के दौरान बड़ी मात्रा में पानी बहकर निकल जाता था। अब उसी पानी को डबरियों में रोककर खेती और दूसरी आजीविका गतिविधियों में इस्तेमाल किया जा रहा है। इस तरह जल संरक्षण (Farm Pond Dhamtari) सीधे ग्रामीण परिवारों की आर्थिक गतिविधियों से जुड़ गया है।
डबरी में मछली के साथ झींगा पालन
डबरियों में सिर्फ पानी जमा नहीं किया जा रहा, बल्कि इन्हें मत्स्य पालन के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रत्येक डबरी में औसतन 320 आईएमसी और 1600 झींगा मछली के बीज डाले गए हैं। बेहतर देखरेख के कारण आईएमसी मछलियां अब करीब 400 से 500 ग्राम तक की हो चुकी हैं और बाजार में बिक्री के लिए तैयार हो रही हैं।
इससे किसानों को खेती के साथ आय का दूसरा स्रोत मिल रहा है। जल संरचना का उपयोग बढ़ने से ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार और आमदनी की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। कुकरेल में तैयार यह मॉडल (Farm Pond Dhamtari) जल संरक्षण को सीधे मछली पालन और ग्रामीण आजीविका से जोड़ रहा है।
2.30 लाख की संरचना को मिला तकनीकी सहयोग
इन फार्म पॉन्ड के निर्माण के लिए लगभग 2.30 लाख रुपये की स्वीकृति दी गई है। इसके बाद इन्हें ज्यादा लाभकारी बनाने के लिए एबीआईएस सीएसआर का तकनीकी सहयोग लिया जा रहा है। ग्रामीणों को वैज्ञानिक तरीके से मछली पालन करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
इसके अलावा रियायती दरों पर गुणवत्तापूर्ण मत्स्य आहार उपलब्ध कराया जा रहा है। विशेषज्ञों की ओर से लगातार निगरानी भी की जा रही है, ताकि मछली पालन की उत्पादन क्षमता बेहतर हो और ग्रामीणों को इसका अधिक आर्थिक लाभ मिल सके।
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जल संरक्षण से आत्मनिर्भरता तक पहुंचा मॉडल
कुकरेल का यह मॉडल बताता है कि अगर बारिश के पानी को रोकने के साथ उसका बेहतर इस्तेमाल किया जाए तो ग्रामीणों की आय के नए रास्ते खोले जा सकते हैं। डबरियों के जरिए एक तरफ सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ मछली और झींगा पालन से अतिरिक्त आमदनी का अवसर मिल रहा है।
आदिवासी बहुल कुकरेल में तैयार की गई ये डबरियां अब सिर्फ जल संचयन की संरचनाएं नहीं रह गई हैं। ये ग्रामीणों के लिए खेती, मत्स्य पालन, रोजगार और आत्मनिर्भरता का आधार बन रही हैं। जल संरक्षण और आजीविका का यह मॉडल (Farm Pond Dhamtari) दूसरे ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी उदाहरण बन सकता है।
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