सीजी भास्कर, 19 जुलाई : छत्तीसगढ़ में आत्मसमर्पित नक्सली अब बंदूक की जगह लोकतांत्रिक राजनीति (Former Naxals Politics) का रास्ता अपनाने की तैयारी में हैं। तेलंगाना में रह रहे कई पूर्व माओवादी नेताओं ने बस्तर की 12 विधानसभा सीटों को केंद्र में रखकर नई राजनीतिक रणनीति बनानी शुरू कर दी है। इसके लिए नए राजनीतिक दल के गठन की तैयारी की जा रही है।
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सूत्रों के मुताबिक, पूर्व नक्सली नेताओं के बीच लगातार बैठकें और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए चुनावी रणनीति तैयार की जा रही है। फिलहाल इस संबंध में किसी राजनीतिक दल का औपचारिक पंजीकरण या चुनाव आयोग की ओर से पुष्टि नहीं हुई है।
बस्तर (Former Naxals Politics) को केंद्र में रखकर तैयार की जा रही इस रणनीति का नेतृत्व तेलंगाना के पुनर्वास केंद्रों में रह रहे पूर्व माओवादी नेता थिपरी तिरूपति उर्फ देवजी, बंडी प्रकाश उर्फ प्रभात, पूलुरी प्रसाद उर्फ चंद्रना और सुजातका उर्फ पदमा कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि छत्तीसगढ़ के पुनर्वास केंद्रों में रह रहे कुछ पूर्व नक्सली भी उनके संपर्क में हैं।
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वीडियो कॉन्फ्रेंस से बन रही रणनीति
सूत्रों के अनुसार पूर्व नक्सली नेता तेलंगाना (Former Naxals Politics) में रहकर लगातार बैठकें कर रहे हैं। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पुनर्वास केंद्रों में मौजूद अन्य आत्मसमर्पित नक्सलियों को लोकतांत्रिक तरीके से जल, जंगल और जमीन से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक संघर्ष के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
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नए राजनीतिक दल की तैयारी
जानकारी के मुताबिक पूर्व माओवादी नेता जम्पन्ना ने भी “डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट पार्टी” के नाम से राजनीतिक दल बनाने की घोषणा की है। सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए समर्थकों को जोड़ने का अभियान भी चलाया जा रहा है।
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दलित-आदिवासी वोट बैंक पर फोकस
सूत्रों का दावा है कि प्रस्तावित राजनीतिक रणनीति में दलित और आदिवासी समुदाय को प्रमुख आधार बनाया जा रहा है। इसके लिए जनसंपर्क अभियान और पर्चों के माध्यम से लोगों तक पहुंचने की तैयारी की जा रही है। इस पहल में हिंसा या हथियारों की बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए अपनी बात रखने पर जोर दिया जा रहा है।
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पुनर्वास केंद्रों में हजारों पूर्व नक्सली
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़, तेलंगाना, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के पुनर्वास केंद्रों में बड़ी संख्या में आत्मसमर्पित नक्सली रह रहे हैं। अकेले छत्तीसगढ़ (Former Naxals Politics) में 2,948 पूर्व नक्सली पुनर्वास केंद्रों में हैं, जबकि तेलंगाना में करीब 1,000 आत्मसमर्पित नक्सली रह रहे हैं। इनमें से 502 छत्तीसगढ़ के बताए जाते हैं।
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कुछ दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं
सूत्रों का यह भी दावा है कि तेलंगाना में पूर्व नक्सली नेताओं को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता मिलने के कारण वहीं से राजनीतिक गतिविधियों का संचालन किया जा रहा है। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि कुछ बड़े पूर्व नक्सली नेताओं ने कथित रूप से संगठन की छिपाई गई नकदी और सोने की जानकारी अब तक जांच एजेंसियों को नहीं दी है। हालांकि इन दावों की किसी आधिकारिक एजेंसी ने पुष्टि नहीं की है, इसलिए इन्हें फिलहाल स्रोतों के दावे के रूप में ही देखा जा रहा है।



