सीजी भास्कर, 18 जुलाई। देश में ट्रेनों में बढ़ती भीड़ और उससे होने वाले हादसों को लेकर सर्वोच्च अदालत ने गंभीर (Supreme Court) चिंता जताई है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि भीड़ की वजह से होने वाली दुर्घटनाएं अब सामान्य घटना बनती जा रही हैं और इन्हें रोकने के लिए रेलवे को प्रभावी कदम उठाने होंगे। अदालत ने यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने पर जोर दिया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने रेलवे के कामकाज से जुड़े कुछ पुराने तौर तरीकों पर भी सवाल उठाए। साथ ही यात्रियों के लिए इस्तेमाल होने वाली शब्दावली में बदलाव का सुझाव देते हुए कहा कि संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप श्रेणी का संबंध डिब्बे से होना चाहिए, न कि यात्री से।

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ट्रेनों में भीड़ रोकने के लिए उठाए जाएं ठोस कदम Supreme Court
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने भारतीय रेलवे से कहा कि ट्रेनों में अत्यधिक भीड़ को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए। अदालत ने कहा कि भीड़ के कारण यात्रियों के चलती ट्रेन से गिरने और जान गंवाने की घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं, इसलिए केवल दिशा निर्देश पर्याप्त नहीं हैं, उनका प्रभावी पालन भी जरूरी है।
दूसरे दर्जे का यात्री शब्द हटाने का सुझाव
सुनवाई के दौरान अदालत ने रेलवे मैनुअल में प्रयुक्त दूसरे दर्जे का यात्री शब्द पर भी आपत्ति जताई। अदालत का कहना था कि श्रेणी का संबंध केवल कोच से होना चाहिए, किसी व्यक्ति से नहीं। न्यायालय ने कहा कि देश के सामाजिक और संवैधानिक मूल्यों को देखते हुए ऐसी शब्दावली पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
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महिला को 8 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश Supreme Court
यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान आई जिसमें वर्ष 2015 में एक व्यक्ति की चलती ट्रेन से गिरने के कारण मौत हो गई थी। उसकी पत्नी ने मुआवजे की मांग की थी, लेकिन टिकट नहीं मिलने के आधार पर दावा खारिज कर दिया गया था।
सर्वोच्च अदालत ने माना कि केवल टिकट बरामद नहीं होने से यह नहीं माना (Supreme Court) जा सकता कि मृतक वैध यात्री नहीं था। अदालत ने रेलवे को चार सप्ताह के भीतर महिला को 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। निर्धारित समय में भुगतान नहीं होने पर राशि पर 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
रेलवे को कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने की सलाह
अदालत ने कहा कि रेलवे के दिशा निर्देशों में भीड़ नियंत्रण के लिए पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो रहा है। न्यायालय ने सुझाव दिया कि रेलवे जरूरत के अनुसार अधिक कर्मचारियों की नियुक्ति पर विचार करे। इससे युवाओं को रोजगार मिलेगा और यात्रियों की सुरक्षा भी बेहतर होगी।
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यात्रियों की जिम्मेदारी भी बताई
सर्वोच्च अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी केवल रेलवे की नहीं हो सकती। यात्रियों को भी भीड़ भरी ट्रेनों में अनावश्यक जोखिम लेने से बचना चाहिए और अपनी सुरक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए।


