सीजी भास्कर, 28 जुलाई। रात के करीब 12 बज चुके थे और पूरा गांव सो रहा था, लेकिन शीतला माता मंदिर में बैगा, बुजुर्ग और ग्रामीण पूजा के लिए इकट्ठा थे। पूजा के बाद सभी नारियल और पूजन सामग्री लेकर गांव की चारों दिशाओं की ओर निकले, जबकि बाकी लोग घरों के भीतर ही रहे। (Savanahi Tradition)
इस दौरान घरों के बाहर दीवार पर गोबर से निशान भी बनाए गए। ग्रामीणों को सिर्फ कोटवार के हांका लगाने का इंतजार था, जिससे गांव बांधे जाने की सूचना मिलती है।
दुर्ग जिले के ग्राम कचांदुर में हर साल की तरह सवनाही (गांव बांधने) की परंपरा निभाई गई। मान्यता है कि इस पूजा से गांव पर देवी-देवताओं का आशीर्वाद रहता है और बीमारी, महामारी और प्राकृतिक आपदा दूर रहती है।
जब कचांदुर पहुंची तो ग्रामीणों ने बताया कि समय बदलने के बाद भी यह परंपरा पूरे विश्वास के साथ जारी है।
गांव की चारों दिशाओं में होती है पूजा : Savanahi Tradition
ग्राम पंचायत कचांदुर के सरपंच कीर्तन साहू बताते हैं कि गांव बांधने की शुरुआत सावन लगने से पहले शनिवार और रविवार की आधी रात को होती है। सबसे पहले शीतला माता मंदिर में पूजा होती है।
इसके बाद बैगा गांव के बुजुर्गों के साथ गांव की चारों दिशाओं में जाते हैं। वहां छोटे-छोटे गड्ढे खोदकर नारियल, चावल, अगरबत्ती और दूसरी पूजा की सामग्री चढ़ाई जाती है। गांव की सीमा और देवी-देवताओं के स्थान पर भी पूजा होती है।
कीर्तन साहू कहते हैं, यह परंपरा हमें हमारे बुजुर्गों से मिली है। गांव में सुख-शांति बनी रहे, किसी तरह का नुकसान न हो और पूरा गांव सुरक्षित रहे, इसी कामना के साथ यह पूजा की जाती है।

हांका पड़ने तक घर से बाहर नहीं निकलते लोग
इस परंपरा का सबसे खास नियम यह है कि पूजा पूरी होने तक गांव के लोग अपने घरों से बाहर नहीं निकलते। जब बैगा पूजा करके लौट आता है, तब गांव का कोटवार हांका लगाकर इसकी जानकारी देता है। इसके बाद ही लोग घर से बाहर निकलते हैं।
इस पूजा में सिर्फ बैगा और गांव के कुछ बुजुर्ग शामिल होते हैं। गांव की परंपरा के अनुसार महिलाएं इसमें शामिल नहीं होतीं।
पहले पूजा में ज्यादा समय लगता था : Savanahi Tradition
ग्राम पंचायत के उपसरपंच बुधराम वर्मा बताते हैं कि यह परंपरा बहुत पुराने समय से चली आ रही है। गांव के सभी देवी-देवताओं की पूजा की जाती है और चारों दिशाओं में जाकर नारियल चढ़ाया जाता है।


