सीजी भास्कर, 24 अगस्त। मामूली सजा के आधार पर किसी कर्मचारी को पदोन्नति की दौड़ से बाहर (Promotion Case) नहीं किया जा सकता। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग से जुड़े एक मामले में यह अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि बिना संचयी प्रभाव के वेतनवृद्धि रोकना मामूली दंड है और इसके आधार पर कर्मचारी के प्रमोशन पर विचार करने का अधिकार नहीं छीना जा सकता।
कोर्ट ने पुलिसकर्मी शेखर सिन्हा की याचिका स्वीकार करते हुए अधिकारियों को उनके पदोन्नति के दावे पर विचार करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही कहा कि यदि वे पदोन्नति के पात्र पाए जाते हैं तो उन्हें उनके कनिष्ठ कर्मचारियों को मिले प्रमोशन की तारीख से सभी संबंधित लाभ दिए जाएं।

Promotion Case में हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी Promotion Case
मामला पुलिसकर्मी शेखर सिन्हा से जुड़ा है। वर्ष 2021 में विभागीय कार्रवाई के तहत उनकी एक वेतनवृद्धि बिना संचयी प्रभाव के रोक दी गई थी।
इसके बाद विभाग में सहायक उप निरीक्षक पद पर प्रमोशन की प्रक्रिया शुरू हुई। इस दौरान अन्य सहकर्मियों के नाम पर पदोन्नति के लिए विचार किया गया, लेकिन शेखर सिन्हा के मामले को प्रमोशन के लिए विचार में शामिल नहीं किया गया।
मामूली दंड को बनाया प्रमोशन न देने का आधार
याचिका में पदोन्नति पर विचार नहीं किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई थी। मामले की सुनवाई के दौरान सवाल उठा कि बिना संचयी प्रभाव के एक वेतनवृद्धि रोकने जैसे मामूली दंड के आधार पर कर्मचारी को प्रमोशन के अधिकार से वंचित किया जा सकता है या नहीं।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह की सजा को आधार बनाकर कर्मचारी को पदोन्नति के लिए विचार से बाहर नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने इसे कर्मचारी के पदोन्नति संबंधी अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना।
शेखर सिन्हा के प्रमोशन पर फिर होगा विचार
न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए संबंधित अधिकारियों को शेखर सिन्हा के पदोन्नति के दावे पर नियमानुसार विचार करने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने कहा कि यदि विचार के बाद शेखर सिन्हा पदोन्नति के लिए पात्र पाए जाते हैं, तो उन्हें उनके कनिष्ठ कर्मचारियों को जिस तारीख से प्रमोशन मिला था, उसी तारीख से पदोन्नत पद के लाभ दिए जाएं।
कनिष्ठों की प्रमोशन तारीख से मिलेंगे लाभ
अदालत के निर्देश के अनुसार, पदोन्नति के लिए पात्र पाए जाने की स्थिति में शेखर सिन्हा को केवल भविष्य के लिए लाभ नहीं मिलेगा। उन्हें उस तारीख से पदोन्नति संबंधी लाभ देने पर विचार किया जाएगा, जिस तारीख से उनके कनिष्ठ कर्मचारियों को सहायक उप निरीक्षक पद पर प्रमोशन दिया गया था।
हाईकोर्ट का यह फैसला विभागीय दंड और पदोन्नति के मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फैसले से यह स्पष्ट हुआ है कि मामूली दंड को अपने आप कर्मचारी को प्रमोशन के लिए विचार से बाहर करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।




