सीजी भास्कर, 29 अक्टूबर । छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) की मुख्य परीक्षा की उत्तरपुस्तिका से चार पन्ने गायब होने के मामले में हाईकोर्ट ने आयोग को जिम्मेदार ठहराया है। जस्टिस पीपी साहू की बेंच ने अभ्यर्थी नारायण दत्त को 50 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि मूल्यांकन के दौरान ही उत्तरपुस्तिका के पन्ने गायब होने की जानकारी मिल गई थी, लेकिन इसके बावजूद अभ्यर्थी को सूचित नहीं किया गया और जिम्मेदार व्यक्ति का पता लगाने के लिए भी ठोस कदम नहीं उठाए गए। (CGPSC Mains Answer Sheet Missing)
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आरटीआई से सामने आई पन्ने गायब होने की जानकारी : CGPSC Mains Answer Sheet Missing
बिलासपुर निवासी नारायण दत्त ने वर्ष 2018 में CGPSC की सिविल सेवा भर्ती परीक्षा के लिए आवेदन किया था। प्रारंभिक परीक्षा पास करने के बाद वह मुख्य परीक्षा में शामिल हुए, लेकिन उनका चयन नहीं हो सका। इसके बाद उन्होंने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत अपनी उत्तरपुस्तिका की कॉपी मांगी।
जांच में पता चला कि सामान्य अध्ययन-5 यानी पेपर-7 के भाग-2 से पेज नंबर 17 से 20 तक गायब थे। इन चार पन्नों पर प्रश्न क्रमांक 9 से 12 तक के उत्तर लिखे गए थे, जिनके कुल अंक 30 थे। अभ्यर्थी ने 5 फरवरी 2021 को संबंधित अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिलने पर हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी।

आयोग ने कहा- पूरे अंक मिलने पर भी चयन नहीं होता
सुनवाई के दौरान आयोग ने बताया कि मूल्यांकनकर्ता ने 27 सितंबर 2019 को ही उत्तरपुस्तिका के पन्ने गायब होने की रिपोर्ट दे दी थी। आयोग का तर्क था कि यदि अभ्यर्थी को गायब पन्नों के पूरे 30 अंक भी मिल जाते, तब भी उसके कुल अंक 725.5 होते, जबकि अनारक्षित वर्ग के अंतिम चयनित अभ्यर्थी के 737.5 अंक थे।
अभ्यर्थी को वास्तव में 695.5 अंक मिले थे। आयोग ने इसी आधार पर कहा कि गायब पन्नों के पूरे अंक मिलने के बावजूद चयन की संभावना नहीं थी।
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जिम्मेदारी से नहीं बच सकता आयोग: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने आयोग के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि चयन की संभावना नहीं होने का हवाला देकर आयोग अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। उत्तरपुस्तिका के पन्ने गायब होने की जानकारी (CGPSC Mains Answer Sheet Missing) मिलने के बाद अभ्यर्थी को सूचित नहीं करना, जिम्मेदार व्यक्ति की पहचान के लिए ठोस कार्रवाई नहीं करना और जांच पूरी नहीं करना गंभीर चूक है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि इस लापरवाही के कारण अभ्यर्थी को मानसिक परेशानी हुई। उसे जानकारी जुटाने और मुकदमा लड़ने में भी खर्च उठाना पड़ा। इन परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने आयोग के संबंधित अधिकारियों को तीन महीने के भीतर अभ्यर्थी को 50 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया और याचिका का निराकरण कर दिया।
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