सीजी भास्कर, 07 अगस्त : पति पत्नी के बीच होने वाले छोटे मोटे विवाद और रोजमर्रा की नोकझोंक को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी (High Court Divorce) की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सामान्य वैवाहिक मतभेदों को मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता और केवल ऐसे कारणों के आधार पर विवाह समाप्त नहीं किया जा सकता। इस फैसले को पारिवारिक मामलों में अहम माना जा रहा है।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों के तर्कों और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण किया। इसके बाद हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा पति के पक्ष में दी गई तलाक की डिक्री को निरस्त करते हुए कहा कि इस मामले में तलाक देने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार मौजूद नहीं थे।

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फैमिली कोर्ट का फैसला किया रद्द High Court Divorce
डिवीजन बेंच ने कहा कि पति पत्नी के बीच सामान्य घरेलू तकरार और छोटे मोटे मतभेद वैवाहिक जीवन का हिस्सा होते हैं। इन्हें मानसिक क्रूरता मानकर तलाक का आधार नहीं बनाया जा सकता।
पत्नी ने साथ निभाने की कोशिश की
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि पत्नी लगातार वैवाहिक संबंध बनाए रखने का प्रयास करती रही। वहीं पति की ओर से साथ रहने के लिए पर्याप्त प्रयास किए जाने के साक्ष्य सामने नहीं आए।
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पति के आरोपों को नहीं माना विश्वसनीय High Court Divorce
हाईकोर्ट ने पति के उस आरोप को भी स्वीकार नहीं किया जिसमें कहा गया था कि पत्नी उसके सांवले रंग और निजी नौकरी को लेकर उसका अपमान करती थी। अदालत ने कहा कि दोनों विवाह से पहले एक दूसरे को अच्छी तरह जानते थे, इसलिए यह आरोप परिस्थितियों के अनुरूप विश्वसनीय नहीं माना जा सकता।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के समर घोष बनाम जया घोष मामले का उल्लेख करते (High Court Divorce) हुए कहा कि मानसिक क्रूरता तभी मानी जाएगी जब उसका प्रभाव इतना गंभीर हो कि पति पत्नी का साथ रहना व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाए। इस मामले में ऐसे हालात साबित नहीं हुए, इसलिए तलाक की डिक्री को रद्द कर दिया गया।
यह फैसला स्पष्ट करता है कि केवल सामान्य वैवाहिक मतभेद या घरेलू तकरार के आधार पर विवाह विच्छेद की अनुमति नहीं दी जा सकती और प्रत्येक मामले का निर्णय तथ्यों तथा साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाएगा।
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