सीजी भास्कर, 08 सितम्बर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुस्लिम महिला के वैवाहिक अधिकारों से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। (High Court Sharia Court Verdict)
- संगठनों को अदालत का दर्जा नहीं : High Court Sharia Court Verdict
- धार्मिक संस्था कानूनी घोषणा नहीं कर सकती
- निरोश अब्बासी के वैवाहिक मामले में आया फैसला : High Court Sharia Court Verdict
- सुप्रीम कोर्ट के विश्व लोचन मदन फैसले का भी दिया हवाला
- कानूनी अधिकारों का फैसला सिर्फ सक्षम अदालत या प्राधिकारी करेगा : High Court Sharia Court Verdict
संगठनों को अदालत का दर्जा नहीं : High Court Sharia Court Verdict
कोर्ट ने साफ कहा कि कोई भी निजी धार्मिक संस्था या खुद को शरिया कोर्ट बताने वाला संगठन, कानून से बनी अदालत का दर्जा नहीं रखता।
धार्मिक संस्था कानूनी घोषणा नहीं कर सकती
ऐसी संस्थाएं धार्मिक राय तो दे सकती हैं, लेकिन किसी महिला के वैवाहिक दर्जे का कानूनी फैसला नहीं कर सकतीं और न ही विवाह खत्म होने की कानूनी घोषणा कर सकती हैं।

निरोश अब्बासी के वैवाहिक मामले में आया फैसला : High Court Sharia Court Verdict
मामला रायपुर की रहने वाली निरोश अब्बासी से जुड़ा है। उनके पहले पति की साल 2015 में मौत हो गई थी। इसके बाद उन्होंने जुलाई 2020 में मोहम्मद आबिद खान से निकाह किया।
शादी के बाद बच्चों और नए परिवार के बीच तालमेल को लेकर पति-पत्नी में विवाद शुरू हो गया। महिला ने पति और ससुराल वालों पर उत्पीड़न और क्रूरता के आरोप लगाए, जिसके बाद पुलिस में FIR भी दर्ज हुई।
इसी बीच इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट ने 18 जनवरी 2022 को महिला को उसके पति से तलाकशुदा बताया था।
सुप्रीम कोर्ट के विश्व लोचन मदन फैसले का भी दिया हवाला
इस आदेश को चुनौती देने पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि इदारा-ए-शरिया का यह आदेश किसी वैधानिक न्यायिक व्यवस्था के तहत जारी नहीं हुआ है।
इसलिए इस आदेश से न तो विवाह कानूनी रूप से खत्म हो सकता है और न ही किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार या वैवाहिक स्थिति में बदलाव किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विश्व लोचन मदन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का भी हवाला दिया और कहा कि दारुल कजा या फतवा जारी करने वाली निजी संस्थाओं को कानून से स्थापित अदालत का दर्जा हासिल नहीं है।
कानूनी अधिकारों का फैसला सिर्फ सक्षम अदालत या प्राधिकारी करेगा : High Court Sharia Court Verdict
हालांकि, कोर्ट ने तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता पर इस मामले में कोई फैसला नहीं दिया है।
हाईकोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि धार्मिक संस्था की राय अपनी जगह है, लेकिन कानूनी फैसला सिर्फ सक्षम अदालत या संबंधित प्राधिकारी ही कर सकता है।



