सीजी भास्कर, 19 अगस्त। धमतरी के सरईटोला गांव की मांदर की थाप जब नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन (Dhamtari Culture) में गूंजी तो वहां मौजूद लोगों को छत्तीसगढ़ की मिट्टी और लोकजीवन की झलक देखने को मिली। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ग्राम सरईटोला गुडरापार के जय गढ़िया बाबा आदिवासी लोक मांदरी नृत्य दल ने राष्ट्रपति भवन के सेंट्रल हॉल में पारंपरिक लोकनृत्य की प्रस्तुति दी।
गांव के कलाकारों के लिए यह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं बल्कि अपनी पीढ़ियों पुरानी परंपरा को देश के सबसे प्रतिष्ठित मंचों में से एक तक पहुंचाने का ऐतिहासिक अवसर रहा। पारंपरिक गीत, वाद्य, वेशभूषा और सामूहिक नृत्य ने समारोह में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक छटा बिखेर दी।

मांदर की थाप में दिखी जनजातीय संस्कृति Dhamtari Culture
सरईटोला का लोकनृत्य दल अपनी पारंपरिक नृत्य शैली और गुट्टा मांदर की ऊर्जावान थाप के लिए जाना जाता है। दल की प्रस्तुतियों में आदिवासी समाज के लोकजीवन, उत्सव, सामाजिक जुड़ाव और सामुदायिक एकता की झलक देखने को मिलती है।
रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधान, आभूषण और लोक वाद्य कलाकारों की प्रस्तुति को और खास बनाते हैं। यह नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोकस्मृतियों और सांस्कृतिक पहचान को आगे बढ़ाने का जरिया भी है।
फसल कटाई, मेले, उत्सव और विभिन्न सामाजिक अवसरों पर इस लोकनृत्य की विशेष प्रस्तुतियां होती रही हैं।
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राष्ट्रपति भवन के लिए हुआ विशेष चयन
दल के सचिव रूपराय नेताम ने बताया कि नागपुर सांस्कृतिक भवन ने दल की पारंपरिक कला और उत्कृष्ट प्रस्तुति को देखते हुए स्वतंत्रता दिवस समारोह के लिए राष्ट्रपति भवन में प्रस्तुति देने के लिए चयन किया था।
देश के सर्वोच्च संवैधानिक संस्थान के प्रतिष्ठित मंच पर छत्तीसगढ़ की लोककला प्रस्तुत करने का मौका कलाकारों के लिए बेहद सम्मान और गर्व का विषय रहा।

सरईटोला से दिल्ली तक पहुंची लोककला
इस ऐतिहासिक प्रस्तुति में सरईटोला के रतन लाल निषाद, सुरेंद्र सोरी, हेमंत सोरी, सुलोचना सोरी और मधु नेताम सहित दल के अन्य कलाकारों ने हिस्सा लिया।
ग्रामीण अंचल से निकलकर राष्ट्रीय राजधानी के प्रतिष्ठित मंच तक पहुंची कलाकारों की यह यात्रा बताती है कि लोककला आज भी अपनी मौलिकता और जीवंतता के कारण लोगों से जुड़ाव बनाए हुए है।
यह उपलब्धि धमतरी के युवा कलाकारों के लिए भी प्रेरणादायक है। इससे यह संदेश मिलता है कि अपनी जड़ों और परंपराओं से जुड़े रहकर स्थानीय प्रतिभा को राष्ट्रीय पहचान दिलाई जा सकती है।
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कलेक्टर ने कलाकारों को दी बधाई
कलेक्टर मिश्रा ने कलाकारों और समिति के सदस्यों को बधाई देते हुए कहा कि राष्ट्रीय मंच पर धमतरी की लोक परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और आदिवासी कला का प्रदर्शन पूरे जिले के लिए गर्व का विषय है।
उन्होंने कहा कि ऐसी उपलब्धियां जिले की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊंचाई देने के साथ युवा पीढ़ी को अपनी लोक परंपराओं से जुड़ने और उन्हें आगे बढ़ाने की प्रेरणा देती हैं।
कलेक्टर ने कहा कि धमतरी की पहचान सिर्फ प्राकृतिक और कृषि समृद्धि तक सीमित नहीं है। यहां की लोककला, लोकसंगीत, जनजातीय परंपराएं और सांस्कृतिक विविधता भी जिले की महत्वपूर्ण धरोहर हैं।

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लोककला को संरक्षण की जरूरत
धमतरी के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में आज भी लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक वाद्य और उत्सवों से जुड़ी कई परंपराएं जीवित हैं। ऐसे कलाकारों को बड़े मंच मिलने से इन लोक परंपराओं को संरक्षण और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर मिलता है।
राष्ट्रपति भवन में हुई यह प्रस्तुति इसी सांस्कृतिक विरासत की राष्ट्रीय अभिव्यक्ति बनकर सामने आई। मांदर की गूंज ने धमतरी की माटी और छत्तीसगढ़ की लोक आत्मा को देश के सामने रखा।
सरईटोला के कलाकारों की यह उपलब्धि Dhamtari Culture के लिए नई पहचान बनाने वाली है। साथ ही यह आने वाली पीढ़ी के कलाकारों को अपनी परंपराओं से जुड़े रहने और उन्हें राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने की प्रेरणा भी देगी।
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रिपोर्टर – रिजवान मेमन




